बच्चों, बहुत खोजबीन के बाद, अचपन जी ने नन्हा मन पर उड़न तश्तरी उतारने में सफलता पाई ! देखा ? तो.. सी-बॉक्स में अपनी प्रतिक्रिया दो !

पढ़ने वाले भैय्या, अँकल जी और आँटी जी,
आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
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प्यारे बच्चो , आपको और सभी भारतवासियों को आजादी की हार्दिक बधाई और शुभ-काम्नायें । स्वतंत्रता दिवस पर पढिए देश भक्ति की रचनाएं यहां ......

31 जनवरी 2010

ढपोलशंख की सुनो कहानी --संजीव 'सलिल'

किसी नगर में किसी समय, रहता था सज्जन एक.
भक्त नर्मदा मैया का था, कम था बुद्धि-विवेक..

जो चाहे उसको ठग लेता, घर आकर पछताता.
काम करे जो भी उसमें वह, था नुकसान उठाता..

ख़त्म हुई पूंजी तो सोचा, काम करूँ धन लाऊँ.
मात, पिता, पत्नी, बच्चों की, कुछ तो क्षुधा मिटाऊँ.

भटका सारा दिन न किसी से, काम मिला ना भीख.
खाली हाथों घर लौटा वह, पाकर कोरी सीख..

रुष्ट पिता, माता, पत्नी थे, सबने मिल फटकारा.
हो हताश 'अब डूब मरूँगा, उसने यही विचारा.'

गया नर्मदा तट पर पर, उसने किया स्नान फिर ध्यान.
उठा डूब मरने को, रेवा माँ का कर आव्हान..

तभी सुनी वाणी: 'बेटा! निज हत्या होती पाप.
कर उद्यम तो मिट जायेगा मन का सब संताप..

कहा युवा ने:'श्रमकर हारा, दें मुझको वरदान.
या मत रोकें मर जाने दें, होगा यह अहसान'..

कलकल जल धारा में बहता आया बर्तन एक.
'जो माँगेगा पा जायेगा,कष्ट न होगा नेक'..

खुश हो घर की और चला वह, थका किया विश्राम.
भूख मिटाने भोजन माँगा, बर्तन से उस शाम..

देख रहा था सेठ, हवेली से उसको बुलवाया.
बोला:'सो जा थका हुआ है, कैसा तन कुम्हलाया?'

सब सच कहकर युवा सो गया, सेठ नहीं सो पाया.
बदल लिया उसने बर्तन, तब चैन तनिक आ पाया..

सुबह उठा घर गया युवा, पत्नी को सौंपा बर्तन.
नहा-ध्यानकर बर्तन से, उसने माँगा फिर भोजन..

कुछ न मिला तो फिर पत्नी ने उसको मारा ताना.
ठगा नर्मदा मैया ने भी?,मैंने सच क्यों माना ?

अब न रुकूँगा, डूब मरूँगा, सोच नदी तक आया.
कूदा, निज जल कम कर, माँ रेवा ने उसे बचाया..

कारण पूछा जान गयीं, था किया सेठ ने धोखा.
युवा श्रमी सीधा-सच्चा है, जैसे सोना चोखा.

देकर शंख नर्मदा माँ ने, कहा:'लौट घर जाओ.
सोने की मुद्रा इनसे जब तुम चाहोगे पाओ'..

बीच राह फिर लपक सेठ ने रोका, घर ठहराया.
सच जाना ले शंख, गठरिया में था स्वर्ण धराया.

सोचा एक बार देता हूँ, देख न यह लौटेगा.
मुझको बारम्बार कई गुना स्वर्ण शंख यह देगा..

युवा गया घर, गृहणी ने सोना पाया हर्षाई.
पुलके मात-पिता, बच्चों के मुँह पर लाली छाई..

किया शुरू व्यवसाय, नर्मदा-कृपा जम गया काम.
फला परिश्रम मिली कीर्ति, दस दिश में फैला नाम.

उधर सेठ ने शंख निकाला, माँगा मिला न स्वर्ण.
समझा छल ने छल पाया, चेहरा हुआ विवर्ण..

बेईमान था, विफल हुआ व्यापार बना कंगाल.
कहें ढपोलशंख सब उसको बिगड़ गए थे हाल..

भीख माँगते गया युवा ने लिया उसे पहचान.
बुला मदद की, कहा:'न छलना मत तजना ईमान'..

कथा ढपोलशंख की बच्चों हमको यह सिखलाती.
तजो न हिम्मत, छल से नहीं सफलताएँ मिल पातीं..

जो मेहनत करता उसको वरदान मिला करता है.
छल से पाया धन खो जाता, 'सलिल' नहीं फलता है..

****************************************

1 जन ने कहा है:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

वाह...!
ये तो चमत्कार हो गया!
सुबह तो यहाँ पर श्री रावेंद्रकुमार रवि की पोस्ट दिखाई दे रही थी जिसकी चर्चा http://tetalaa.blogspot.com/2010/01/blog-post_31.html पर भी लगाई थी!
परन्तु अब यह पोस्ट दिखाई ही नही दे रही है!

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