बच्चों, बहुत खोजबीन के बाद, अचपन जी ने नन्हा मन पर उड़न तश्तरी उतारने में सफलता पाई ! देखा ? तो.. सी-बॉक्स में अपनी प्रतिक्रिया दो !

पढ़ने वाले भैय्या, अँकल जी और आँटी जी,
आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
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प्यारे बच्चो , आपको और सभी भारतवासियों को आजादी की हार्दिक बधाई और शुभ-काम्नायें । स्वतंत्रता दिवस पर पढिए देश भक्ति की रचनाएं यहां ......

20 मई 2010

अब्राहम लिंकन का पत्र

अपने पुत्र के शिक्षक के नाम

हे शिक्षक!

मैं जानता हूँ और मानता हूँ

कि न तो हर व्यक्ति सही होता है

और न ही होता हैं सच्चा

किंतु तुम्हें सिखाना होगा कि

कौन बुरा है और कौन अच्छा।

दुष्ट व्यक्तियों के साथसाथ आदर्श प्रणेता भी होते हैं,

स्वार्थी राजनीतिज्ञों के साथसाथ समर्पित नेता भी होते हैं

दुश्मनों के साथसाथ मित्र भी होते हैं,

हर विरूपता के साथ सुन्दर चित्र भी होते हैं।

समय भले ही लग जाए, पर

यदि सिखा सको तो उसे सिखाना

कि पाए हुए पाँच से अधिक मूल्यवान है

स्वयं एक कमाना।

पाई हुई हार को कैसे झेले, उसे यह भी सिखाना

और साथ ही सिखाना, जीत की खुशियाँ मनाना।

यदि हो सके तो उसे ईर्ष्या या द्वेष से परे हटाना

और जीवन में छिपी मौन मुस्कान का पाठ पठाना।

जितनी जल्दी हो सके उसे जानने देना

कि दूसरों को आतंकित करने वाला स्वयं कमजोर होता है,

वह भयभीत व चिंतित है

क्योंकि उसके मन में स्वयं चोर होता है।

उसे दिखा सको तो दिखाना

किताबों में छिपा खजाना।

और उसे वक्त देना चिंता करने के लिए

कि आकाश के परे उड़ते पंछियों का आह्लाद,

सूर्य के प्रकाश में मधुमक्खियों का निनाद,

हरीभरी पहाडि़यों से झांकते फूलों का संवाद,

कितना विलक्षण होता है अविस्मरणीय ! अगाध !

उसे यह भी सिखाना

धेखे से सपफलता पाने से असफल होना सम्माननीय है।

और अपने विचारों पर भरोसा रखना अधिक विश्वसनीय है।

चाहें अन्य सभी उनको गलत ठहरायें

परंतु स्वयं पर अपनी आस्था बनी रहे यह विचारणीय है।

उसे यह भी सिखाना कि वह सदय के साथ सदय हो,

किंतु कठोर के साथ हो कठोर।

और लकीर का फकीर बनकर,

उस भीड़ के पीछे न भागे जो करती हो निरर्थक शोर।

उसे सिखाना

कि वह सबकी सुनते हुए अपने मन की भी सुन सके,

हर तथ्य को सत्य की कसौटी पर कसकर गुन सके।

यदि सिखा सको तो सिखाना कि वह दु:ख में भी मुस्कुरा सके,

घनी वेदना से आहत हो, पर खुशी के गीत गा सके।

उसे यह भी सिखाना कि आंसू बहते हों तो उन्हें बहने दे,

इसमें कोई शर्म नहीं कोई कुछ भी कहता हो कहने दे।

उसे सिखाना

वह सनकियों को कनखियों से हंसकर टाल सके

पर अत्यन्त मृदुभाषी से बचने का ख्याल रखे।

वह अपने बाहुबल व बु​द्धि(बल का अध्कितम मोल पहचान पाए

परंतु अपने हृदय व आत्मा की बोली न लगवाए।

वह भीड़ के शोर में भी अपने कान बन्द कर सके

और स्वत: की अंतरात्मा की सही आवाज सुन सके

सच के लिए लड़ सके और सच के लिए अड़ सके।

उसे सहानभूति से समझाना

पर प्यार के अतिरेक से मत बहलाना।

क्योंकि तपतप कर ही लोहा खरा बनता है,

ताप पाकर ही सोना निखरता है।

उसे साहस देना ताकि वक्त पड़ने पर अधीर बने

सहनशील बनाना ताकि वह वीर बने।

उसे सिखाना कि वह स्वयं पर असीम विश्वास करे,

ताकि समस्त मानव जाति पर भरोसा व आस धरे

यह एक बड़ासा लम्बाचौड़ा अनुरोध है

पर तुम कर सकते हो, क्या इसका तुम्हें बोध है?

मेरे और तुम्हारे दोनों के साथ उसका रिश्ता है

सच मानो, मेरा बेटा एक प्यारासा नन्हा सा फरिश्ता है!

हिन्दी भावानुवाद: मधु पंत, अगस्त 2004

-0-

साभार : http://arvindguptatoys.com

5 जन ने कहा है:

कविता रावत ने कहा…

Bahut pahle padha tha... Aaj phir padhkar bahut achha laga...
Gyanvardhan aur saarthak prayas ke liye bahut dhanyavaad.

माधव ने कहा…

really motivating

Harshad mehta ने कहा…

Bahot Acchha. Motivating.

Amitraghat ने कहा…

प्रेरणास्पद..."

soni garg ने कहा…

ye patra to pehle bhi pada tha lekin aaj fir se pad kar kuch sochne par majboor kar gaya .......Good

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