आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
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पढ़ने वाले भैय्या, अँकल जी और आँटी जी,
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नटखट बचपन नटखट बचपन शैतानी भरा मासूम शरारती बचपन अगर आपको भी भीतर से गुदगुदाता है तो कलम उठाएं और लिख भेजें कोई भी बाल्-रचना और लीजिए बाल-रचना प्रतियोगिता में भाग रचनाएं भेजने की आखिरी तिथी 10-12-09 विस्तृत जानकारी यहां

आपकी सीमा सचदेव

21 November 2009

हिंदी सबके मन बसी

हिंदी सबके मन बसी

आचार्य संजीव'सलिल', संपादक दिव्य नर्मदा

हिंदी भारत भूमि के, जन-गण को वरदान.
हिंदी से ही हिंद का, संभव है उत्थान..

संस्कृत की पौत्री प्रखर, प्राकृत-पुत्री शिष्ट.
उर्दू की प्रेमिल बहिन, हिंदी परम विशिष्ट..

हिंदी आटा माढिए, उर्दू मोयन डाल.
'सलिल' संस्कृत तेल ले, पूड़ी बने कमाल..

ईंट बने सब बोलियाँ, गारा भाषा नम्य.
भवन भव्य है हिंद का, हिंदी ह्रदय प्रणम्य.

संस्कृत पाली प्राकृत, हिंदी उर्दू संग.
हर भाषा-बोली लगे, भव्य लिए निज रंग..

सब भाषाएँ-बोलियाँ, सरस्वती के रूप.
स्नेह पले, साहित्य हो, सार्थक सरस अनूप..

भाषा-बोली श्रेष्ठ हर, त्याज्य न कोई हेय.
सबसे सबका स्नेह ही, हो लेखन का ध्येय..

उपवन में कलरव करें, पंछी नित्य अनेक.
भाषाएँ अगणित रखें, मन में नेह-विवेक..

भाषा बोले कोई भी. किन्तु बोलिए शुद्ध.
दिल से दिल तक जा सके, बनकर दूत प्रबुद्ध..

--दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम
-- सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम

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19 November 2009

नन्हामन - बाल-कहानी प्रतियोगिता -भाग ३

नमस्कार ,
नन्हामन फ़िर से आपके लिए लेकर आया है बाल-रचना प्रतियोगिता - भाग ३ । बाल रचना प्रतियोगिता भाग-३ में आमंत्रित है आपकी बाल-कहानियां । कहानी गद्य/पद्य किसी भी रूप में हो सकती है । तो कलम उठाएं और लिख भेजें कोई भी प्यारी सी बाल- कहानी, भेज दें nanhaman@gmail.com पर और भाग लें बाल-कहानी प्रतियोगिता में । रचनाएं भेजने की अंतिम तिथि १०-१२-२००९ ।

शेर और बिल्ली

एक बार जंगल का शेर
भूखा बैठा कितनी देर
फँसा नही था कोई शिकार
हो गया शेर बहुत लाचार
कैसे अपनी भूख मिटाए ?
कैसे वह कोई जानवर खाए ?
देखी उसने बिल्ली एक
चूहे खाये थे जिसने अनेक


भर गया शेर के मुँह मे पानी
सोची उसने एक शैतानी
बैठ के अपने मन में विचारा
खाए बिना अब नहीं गुजारा
किसी तरह से भूख मिटाए
क्यों न वह बिल्ली को खाए ?
बिल्ली जो बैठी वृक्ष की डाली
नहीं पास वो आने वाली

किसी तरह बिल्ली को बुलाए
चालाकी से उसको खाए
झट से गया बिल्ली के पास
बोला! मौसी मुझको आस (उम्मीद)
तुम तो कितनी समझदार हो
और सब में से होशियार हो
कर दो मुझ पर भी अहसान
मुझे भी अपना शिष्य जान
मुझे भी थोडा ज्ञान सिखा दो
होशियारी का राज बता दो
कहना तेरा हर मानूँगा
सारी उम्र तक सेवा करूँगा
मौसी होती दूसरी माता
समझ लो गुरु-शिष्य का नाता
बड़ी चालाक थी बिल्ली रानी
समझ गई वो सारी कहानी

बोली सब कुछ सिखलाऊँगी
आरम्भ से सब बतलाऊँगी
सीखो तुम पंजे को चलाना
जाल मे अपने शिकार फँसाना
और फिर मुँह में उसको दबाना
मार के उसको मजे से खाना
बिल्ली ने शेर को सब बतलाया
पर न पेड पे चढ़ना सिखाया
शेर का मन , जो नहीं था साफ
करेगा न बिल्ली को माफ
वो तो बिल्ली को खाएगा
उसको ही भोज बनाएगा
सीख लिया उसने गुर सारा
अब तो शेर ने मन में विचारा
बहुत हुआ बिल्ली का भाषण
अब तो चाहिए मुझको भोजन

समझ गई बिल्ली भी चाल
आया उसको एक ख्याल
जब तक झपटा बिल्ली पे शेर
तब तक हो गई बहुत ही देर
चढ़ गई बिल्ली पेड के ऊपर
पहले से बैठी थी जिसपर
बैठ के ऊपर बोली! बच्चे
तुम हो अभी अकल के कच्चे
चल रहे थे मुझ संग चालाकी
पूरी न होगी शिक्षा बाकी
जो मैंने तुमको बतलाया
वो तो बस ऐसे भरमाया
असली राज न तुम्हें बताया
न तुम्हें पेड पे चढ़ना आया
हिम्मत है तो चढ़ के दिखाओ
भोजन अपना मुझे बनाओ

तुमने यह सोचा भी कैसे ?
बातों में तेरी फ़सुंगी ऐसे
दुश्मन पर एतबार करूँगी
और मैं तेरे हाथों मरूँगी
कभी नहीं यह हो सकता
शेर न दोस्त बन सकता
समझ शेर को अब सब आया
अपनी गलती पर पछताया
मन मसोस के शेर रह गया
और जाते-जाते यह कह गया
.....................
शिक्षा तो सच्चे मन से लो
बुरे विचार न मन में पालो
.....................
बच्चो तुम भी बात समझना
बुरे भाव न मन में रखना
रखना तुम सदा सच्चा मन
जिससे होगा सुखमय जीवन
दुश्मन पे एतबार न करना
धोखे से कभी वार न करना
*******************

तुम भी अब हिन्दी में लिखो..

अब जहाँ चाहो, कापी-पेस्ट कर दो !

टेम्पलेट परिकल्पना एवं अनुकूलन : डा. अमर कुमार 2009