नन्हा मन

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08 जून 2010

“श्यामपट (BLACK-BOARD” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)



SHIYAMPAT

तीन टाँग के ब्लैकबोर्ड की, 
मूरत कितनी प्यारी है। 
कोकिल जैसे इस स्वरूप की, 
सूरत जग से न्यारी है। 

कालचक्र में बदल गया सब, 
पर तुम अब भी चमक रहे हो। 
समयक्षितिज पर ध्रुवतारा बन, 
नित्य नियम से दमक रहे हो। 

बना हुआ अस्तित्व तुम्हारा,
राम-श्याम बन रमे हुए हो।
विद्यालय हों या दफ्तर हों,
सभी जगह पर जमे हुए हो।  


रंग-रूप सबने बदला है,
तुम काले हो, वही पुराने।
जग को पाठ पढ़ानेवाले,
लगते हो जाने पहचाने।  


अपने श्यामल तन पर तुम,
उज्जवल सन्देश दिखाते हो।
भूले-भटके राही को तुम,
पथ और दिशा बताते हो।

हिन्दी और विज्ञान-गणित,
या अंग्रेजी के हों अक्षर।
नन्हें सुमनों को सिखलाते,
ज्ञान तुम्ही हो जी भरकर।

गुण और ज्ञान बालकों के,
मन में इससे भर जाता।
श्यामपटल अध्यापकगण को,
सबसे अधिक सुहाता।

08 अप्रैल 2010

"‘नन्हा-तारा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

pranjal copy 
मैं अपनी मम्मी-पापा के,
नयनों का हूँ नन्हा-तारा। 
मुझको लाकर देते हैं वो,
रंग-बिरंगा सा गुब्बारा।।
मुझे कार में बैठाकर,
वो रोज घुमाने जाते हैं।
पापा जी मेरी खातिर,
कुछ नये खिलौने लाते हैं।।

मैं जब चलता ठुमक-ठुमक,
वो फूले नही समाते हैं।
जग के स्वप्न सलोने,
उनकी आँखों में छा जाते हैं।।

ममता की मूरत मम्मी-जी,
पापा-जी प्यारे-प्यारे।
मेरे दादा-दादी जी भी,
हैं सारे जग से न्यारे।।

सपनों में सबके ही,
सुख-संसार समाया रहता है।
हँसने-मुस्काने वाला,
परिवार समाया रहता है।।

मुझको पाकर सबने पाली हैं,
नूतन अभिलाषाएँ।
क्या मैं पूरा कर कर पाऊँगा,
उनकी सारी आशाएँ।।

मुझको दो वरदान प्रभू!
मैं सबका ऊँचा नाम करूँ।
मानवता के लिए जगत में,
अच्छे-अच्छे काम करूँ।। 

01 फ़रवरी 2010

‘‘मेरा कुत्ता बड़ा निराला’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

म्बे-लम्बे कानों वाला।
मेरा कुत्ता बड़ा निराला।।


घर की रखवाली करता है।
नही किसी से यह डरता है।।


प्यारा सा है इसका नाम।
सब कहते हैं इसको टाम।।


खीरा, आम चाव से खाता।
सेव, टमाटर चट कर जाता।।


नित्य नियम से हमें जगाता।
भौं-भौं कर आवाज लगाता।।


प्राची को लगता यह प्यारा।
घर भर का यह राज-दुलारा।।

07 जनवरी 2010

‘‘कौआ’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


कौआ बहुत सयाना होता।

कर्कश इसका गाना होता।।

पेड़ों की डाली पर रहता।

सर्दी, गर्मी, वर्षा सहता।।

कीड़े और मकोड़े खाता।

सूखी रोटी भी खा जाता।।

सड़े मांस पर यह ललचाता।

काँव-काँव स्वर में चिल्लाता।।

साफ सफाई करता बेहतर।

काला-कौआ होता मेहतर।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

23 दिसंबर 2009

"नये-नये कुछ पेड़ लगाना।" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")




प्राण-वायु को देने वाले.
जन-जीवन के हैं रखवाले।
धरती का श्रंगार सजाना,
नये-नये कुछ पेड़ लगाना।।

खट्टे-मीठे, रंग-रँगीले,
फल देते ये बहुत रसीले।
आँगन-बागों की शोभा हैं,
हरे-भरे हैं पेड़ सजीले।।

उपवन में हँसते मुस्काते,
सुंमन हमारे मन को भाते।
वातावरण सुगन्धित करते,
ये सबको पुलकित कर जाते।।

कलियों, फूलों पर मँडराते,
अपना अभिनव राग सुनाते।
सुन्दर पंखों वाली तितली,
भँवरे गुन-गुन करते आते,
(सभी चित्र गूगल सर्च से साभार)

02 नवंबर 2009

"सब बच्चों का प्यारा मामा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")




नभ में कैसा दमक रहा है।
चन्दा मामा चमक रहा है।।

कभी बड़ा मोटा हो जाता।
और कभी छोटा हो जाता।।

करवा-चौथ पर्व जब आता।
चन्दा का महत्व बढ़ जाता।।
महिलाएँ छत पर जाकर के।
इसको तकती हैं जी-भर के।।
यह सुहाग का शुभ दाता है।
इसीलिए पूजा जाता है।।

जब भी वादल छा जाता है।
तब "मयंक" शरमा जाता है।।
लुका-छिपी का खेल दिखाता।
छिपता कभी प्रकट हो जाता।।


धवल चाँदनी लेकर आता।
आँखों को शीतल कर जाता।।
सारे जग से न्यारा मामा।
सब बच्चों का प्यारा मामा।।
(सभी चित्र गूगल सर्च से साभार)

05 जुलाई 2009

"अब पढ़ना मजबूरी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)

खेल-कूद में रहे रात-दिन,

अब पढ़ना मजबूरी है।

सुस्ती - मस्ती छोड़,

परीक्षा देना बड़ा जरूरी है।।


मात-पिता,विज्ञान,गणित है,

ध्यान इन्हीं का करना है।

हिन्दी की बिन्दी को,

माता के माथे पर धरना है।।


देव-तुल्य जो अन्य विषय है,

उनके भी सब काम करेगें।

कर लेंगें, उत्तीर्ण परीक्षा,

अपना ऊँचा नाम करेंगे।।


श्रम से साध्य सभी कुछ होता,

दादी हमें सिखाती है।

रवि की पहली किरण,

हमेशा नया सवेरा लाती है।।

20 जून 2009

"भैया! मुझको भी, लिखना-पढ़ना, सिखला दो।" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयक)



भैया! मुझको भी,

लिखना-पढ़ना, सिखला दो।

क.ख.ग.घ., ए.बी.सी.डी,

गिनती भी बतला दो।।


पढ़ लिख कर मैं,

मम्मी-पापा जैसे काम करूँगी।

दुनिया भर में,

बापू जैसा अपना नाम करूँगी।।


रोज-सवेरे, साथ-तुम्हारे,

मैं भी उठा करूँगी।

पुस्तक लेकर पढ़ने में,

मैं संग में जुटा करूँगी।।


बस्ता लेकर विद्यालय में,

मुझको भी जाना है।

इण्टरवल में टिफन खोल कर,

खाना भी खाना है।।


छुट्टी में गुड़िया को,

ए.बी.सी.डी, सिखलाऊँगी।

उसके लिए पेंसिल और,

इक कापी भी लाऊँगी।।

08 जून 2009

मेरा झूला बड़ा निराला

मम्मी जी ने इसको डाला।
मेरा झूला बड़ा निराला।।

खुश हो जाती हूँ मैं कितनी,

जब झूला पा जाती हूँ।

होम-वर्क पूरा करते ही,
मैं इस पर आ जाती हूँ।

करता है मन को मतवाला।

मेरा झूला बड़ा निराला।।


मुझको हँसता देख,

सभी खुश हो जाते हैं।
बाबा-दादी, प्यारे-प्यारे,

नये खिलौने लाते हैं।

आओ झूलो, मुन्नी-माला।
मेरा झूला बड़ा निराला।।

15 मई 2009

किलकारी भरकर जब बालक - डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक



किलकारी भरकर जब बालक,
पुलक-पुलक मुस्काते हैं।

नया खिलौना पाकर के,
ये फूले नही समाते है।
किलकारी भरकर जब बालक,
पुलक-पुलक मुस्काते हैं।

तुतलाई भोली-भाषा में,
जब ये अधर खोलते हैं,
मम्मी-पापा के मन को,
ये बालक बहुत रिझाते हैं।
किलकारी भरकर जब बालक,
पुलक-पुलक मुस्काते हैं।

माँ की गोदी में इनका,
संसार समाया रहता है,
नन्हें मन की शैतानी से,
ये सबको हर्षाते हैं।
किलकारी भरकर जब बालक,
पुलक-पुलक मुस्काते हैं।
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पढ़ने वाले भैय्या, अँकल जी और आँटी जी,
आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
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