नन्हा मन

बच्चों, बहुत खोजबीन के बाद, अचपन जी ने नन्हा मन पर उड़न तश्तरी उतारने में सफलता पाई ! देखा ? तो.. सी-बॉक्स में अपनी प्रतिक्रिया दो !
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14 अप्रैल 2010

वैसाखी का मेला

नमस्कार बच्चो ,
आपको पता है आज कौन सा दिन है ?....आज है बैसाखी पर्व पंजाब का एक सुप्रसिद्ध त्योहार । आज हम आपको बताएंगे कि यह त्योहार मनाने के पीछे क्या मान्याताएं हैं और यह त्योहार कैसे मनाया जाता है ।



वैसाखी का लगा है मेला
खुश सारे क्या गुरु क्या चेला
आओ सुनाऊँ पुरानी बात
वैसाखी का है इतिहास
सिख धर्म के दश गुरु थे
दशम गुरु श्री गोबिन्द सिंह थे
होता लोगों पे अत्याचार
आया उनको एक विचार
क्यो न ऐसा पंथ बनाएँ
और लोगो की रूह जगाएँ
जिससे समझे खुद को लोग
मिटाएँ अत्याचार का रोग
उसमें सबको शिक्षा देंगे
मानवता के लिए लड़ेंगे
ऐसा पंथ उन्होंने साजा
जिसमें ना परजा ना राजा
होंगे सारे गुरु के शिष्य
सँवारेगे देश का भविष्य
शिष्य चुने उन्होने पाँच
की पहले उन सबकी जाँच
क्या वो देश पे मर सकते है ?
सच्च के लिए क्या लड़ सकते है?
कराया सबको अमृतपान
कड़ा,केस,कञ्घा,किरपान
देकर उनको सिख नवाजा
ऐसे खालसा पंथ था साजा
वैसाखी का दिन था पावन
सन था सोलह सौ निन्यावन
सिख धर्म का यह उपहार
तब से ही मनता त्योहार
.................
.................
एक बात मैं और बताऊँ
एक और इतिहास सुनाऊँ
जब था अपना देश गुलाम
अंग्रेजों का था बस नाम
भारत माँ को बनाया दासी
दुखी थे इससे भारतवासी
किसी तरह भारत को बचाएँ
अंग्रेज़ों को दूर भगाएँ
सन था तब उन्नीस सौ उन्नीस
था वैसाखी का पावन दिन
लोगो ने मिलकर सभा बुलाई
होगी अंग्रेज़ों की विदाई
जगह थी जलियाँ वाला बाग
अमृतसर में है भी आज
अंग्रेजों को पता चला जब
हुए लाल-पीले सुन के तब
नहीं सभा वो होने देंगे
न ही भारत को छोड़ेंगे
आ गया वहाँ पे जनरल डायर
अचनचेत ही कर दिए फायर
लोगो की थी भीड़ अपार
जनरल खड़ा बाग के द्वार
सारा मार्ग बन्द कर दिया
और लाशों से बाग भर दिया
सैकड़ों लोग वहीं पर मर गए
बाकी सबको जागरूक कर गए
व्यर्थ न हुआ उनका खून
लोगों में भर गया जुनून
सबके खून का बदला लेंगे
अंग्रेजो को नहीं सहेंगे
सबने मिलकर लड़ी लड़ाई
अंग्रेज़ों से मुक्ति पाई
हो गया अपना देश आजाद
गए अंग्रेज़ देश से भाग
.................
..................
लगते हैं मेले हर साल
हो किसान जब मालामाल
फसलें जब सारी पक जाती
कट कर जब घर पर आ जाती
भर जाते हैं किसानों के घर
तब उनको नहीं होता कोई डर
वर्षा आए या तूफान
उनपे मेहरबान भगवान
सारे साल का मिल गया खाना
फिर क्यों न त्योहार मनाना
मिल कर सारे नाचे गाएँ
आओ हम वैसाखी मनाएँ
उन शहीदों को भी रखे याद
और ईश्वर से करे फरियाद
खुशियों के लगते रहे मेले
और सारे दुखों को हर ले

बैसाखी पर्व की आप सबको हार्दिक बधाई

कवयित्री- सीमा सचदेव

18 मार्च 2010

मां दुर्गा के नौ रूप -७.मां कालरात्रि ८.मां महागौरी और ९.मां सिद्धिदात्री

नमस्कार बच्चो ,
इससे पहले आपने पढी मां १. शैलपुत्री २.ब्रह्मचारिणी ३.चन्द्रघण्टा ४.कुष्माण्डा ५.स्कन्दमाता ६.कात्यायनी के बारे में जानकारी , अब जानिए ७.मां कालरात्रि ८.मां महागौरी और ९.मां सिद्धिदात्री के बारे में विशेष जानकारी ।

७.मां कालरात्रि

सातवीं माता कालरात्रि
है बच्चो सुखों की दात्रि
दिखने में है रूप भयानक
पर न लाना मन में शक
काली रात मिटा वो देती
सारे दुखों को हर लेती
दुष्टों का वो करे विनाश
करदे जीवन में प्रकाश
जो पूजे , न भय सताए
दुष्ट कोई भी पास न आए
शुभांकरी भी इनका नाम
सिद्ध होते इनसे सब काम

८.मां महागौरी

आठवीं माता गौरी माता
तन मन को देती है शुद्धता
पाप कलंक मिटा ये देती
अपने भक्तों को सुख देती
नाम है इनका पार्वती
पाने को शिवजी को पति
किया इन्होंने तप घनघोर
लगा दिया तन मन का जोर
शिव साधना में हुई मतवाली
पड गई इनकी देह भी काली
फ़िर शिव नें इनको अपनाया
गंगा जल से जा नहलाया
गौर वरण मां नें फ़िर पाया
मन का सब संताप मिटाया
जो इन्हें सच्चे मन से ध्याये
उसके सब संताप मिटाए
उजले वस्त्र और वाहन बैल
धो देती हर मन का मैल

९.मां सिद्धिदात्री

मां दुर्गा की है नवरात्रि
नौवीं माता सिद्धिदात्री
सर्व कार्य सिद्ध करने वाली
मां दुखों को हरने वाली
जो भी इसकी शरण में आए
उसको कोई दुख न सताए
जो भी इनका करते पूजन
पावन करती उनका मन
लोभ मोह अहंकार मिटाए
शरण में इसकी जो भी जाए
कमल और सिंह मां के वाहन
आओ करें हम सब मिल पूजन

नवरात्रों की आप सबको हार्दिक बधाई एवम शुभ-कामनाएं । आपकी-सीमा सचदेव

मां दुर्गा के नौ रूप - ४.मां कुष्माण्डा ५.मां स्कन्दमाता ६.मां कात्यायनी

नमस्कार बच्चो ,
कल आपने पढी मां दुर्गा के पहले तीन रूपों - १. मां शैलपुत्री २.मां ब्रह्मचारिणी ३.मां चन्द्रघण्टा के बारे में जानकारी । आज जानिए मां के और तीन रूप ४.मां कुष्माण्डा ५.मां स्कन्दमाता ६.मां कात्यायनी के बारे में
४.मां कुष्माण्डा

कुष्माण्डा मां माता चौथी
मानसिक दुविधा जिनको होती
या होता कोई दैहिक रोग
कर देती मां उसे निरोग
तन की दुर्बलता को मिटाए
सुन्दर और स्वस्थ बनाए

५.मां स्कन्दमाता

सकन्द माता है माता पंचम
रखती सुत को संग हरदम
मोर और सिंह जिनका वाहन
पूजें इनको जो भी जन
खुशियों से झोली भर देती
मां सारी दुविधा हर लेती

६.मां कात्यायनी

छ्ठी माता हैं मां कात्यायनी
है बच्चो अमोघ फ़लदायिनी
जो करते है इनका पूजन
नहीं बनते उनके कोई दुश्मन
महिषासुर को मारने वाली
देवों को भी तारने वाली
करती शक्ति का संचार
असुरों का जो करे संहार
जो भी मां को शीश नवाएं
मन वाछिंत फ़ल मां से पाएं

मैं कल फ़िर आऊंगी मां के अन्य रूपों की जानकारी के साथ । तब तक शुभ-नवरात्रि

17 मार्च 2010

मां दुर्गा के नौ रूप - १. शैलपुत्री २.ब्रह्मचारिणी ३.चन्द्रघण्टा

नमस्कार बच्चो ,
आप सब जानते ही हैं कि आजकल नवरात्र ( नौ दिन तक चलने वाला त्योहार ) मनाए जा रहे हैं । यह त्योहार पूरे भारत वर्ष मे बडी श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाता है और देवी दुर्गा की पूजा की जाती है । घरों मे पूजा कर व्रत किए जाते हैं और अच्छे-अच्छे पकवान भी तो खाने को मिलते हैं न । आप भी खूब पकवान खा रहे होंगे , मुझे बताना अवश्य कि आपने क्या-क्या खाया , हम सब मिलकर खाएंगे लेकिन उससे पहले नवरात्र संबंधी जानकारी भी ले ली जाए तो त्योहार मनाने का वास्तविक कारण भी जान लेंगें ।देवी दुर्गा के नौ रूप हैं १. शैलपुत्री २.ब्रह्मचारिणी ३.चन्द्रघण्टा ४.कुष्माण्डा ५.स्कन्दमाता ६.कात्यायनी ७.कालरात्री ८.महागौरी ९.सिद्धिदात्री और हर दिन देवी के एक रूप की पूजा होती है । हम लेकर आए हैं आपके लिए देवी दुर्गा के विभिन्न रूपों की संक्षिप्त जानकारी । तो देवी दुर्गा जी का पहला रूप है-

१.शैलपुत्री

पहली देवी दुर्गा माता
जानी जाती शैल सुता
सत्य निष्ठा और समर्पण
किया जिसने शिव को वरण
प्रथम जन्म में सती कहाई
यग्य में पिता के आई
देखा पति का हुआ अपमान
नहीं मिला उसको सम्मान
यग्याग्नि में खुद को मिटाया
अपना पत्नी फ़र्ज़ निभाया
अगला जनम हिमालय के घर
फ़िर से पाया शिव को वर
त्याग और भक्त का नाता
तभी कहलाती दुर्गा माता

२.मां ब्रह्मचारिणी

मां ब्रह्मचारिणी दूसरी माता
तप और आचरण का नाता
जो भी सच्चे मन से ध्याये
मुंह मांगा मां से वर पाए
योग और भक्ति का संगम
मां वर देती है हर दम
होता उन कन्यायों का पूजन
जो पिता घर में पराया धन

३. मां चन्द्रघंटिका

चन्द्रघंटिका तीसरी माता
सुख-समद्धि की है दाता
स्वर्ण भाल में चांद बिराजे
मन-मंदिर में घंटिका बाजे
नन्ही कन्या का करें जो पूजन
देती मां उसे सुख-सुविधा धन
सिंह है बच्चो मां की स्वारी
दस हाथ वाली मां न्यारी

28 फ़रवरी 2010

मैत्री के रंगों की होली - मंजु गुप्ता


मैत्री के रंगों की होली

उड़ा अबीर मला गुलाल ,
हुआ सारा जग लालम लाल
गुजिया , मठरी की बहार ,
स्नेह-मिलन का है त्योहार .
आई है रंगों की होली ,
छुट्टी विद्यालय में हो ली ,
निकली घर से बच्चों की टोली ,
लिए हाथ रंगों की थैली.
लाल - हरे-गुलाबी-नीले,
कितने देखो रंग चमकीले
पिंकी शिंकी आशु राजु
सारे बच्चे आजु-बाजु
रंगों की भर-भर पिचकारी
सबनें इक दूजे पे मारी
रंग गए हैं सबके कपडे
लाल-गुलाल भरे हैं चेहरे
शिंकी पूछे आशु से ,
पिंकी! राजू हैं कौन से ?,
नहीं पहचान में आ रहे,
मैत्री के रंगों से रंगे हुए .
जग में सबको मित्र बनाएं ,
आपस में न लडे-लड़ाएं,
मेरा-तेरा ,भेद भाव मिटाए
"मंजू "संदेश प्रेम का होली लाए

27 फ़रवरी 2010

होली है भई होली है



होली है भई होली है
रंग रंगीली होली है।
नहीं बडा न कोई छोटा
हम सारे हमजोली हैं ।
लाल हरे और नीले पीले
देखो रंग कितने चमकीले
नभ में देखो नई छटा है
रंगी आज घनघोर घटा है ।
अवनि भी हुई रंग-रंगीली
मस्त-मस्त जब आई होली
******************************

होल़ी आई होली आई
खेलें राधा संग कन्हाई
सखियों और ग्वालों के साथ
हाथों में सब लेकर हाथ
रंग डालते हंसते-गाते
गली-गली में धूम मचाते
प्रेम का सब संदेश सुनाते
रंग रंगाते जिधर को जाते
********************************
३.

देखो यह बच्चों की टोली
मिलकर खेल रहे हैं होली
न विरोध न बैर का भाव
मन में भरा हुआ है चाव
रंगों का मौसम है सुहाना
होली बार-बार तुम आना ।
होली पर्व की आप सबको हार्दिक बधाई एवम शुभ-कामनाएं ------ सीमा सचदेव

25 फ़रवरी 2010

राधा - कष्ण की होली

नमस्कार बच्चो , कल मैने सुनाई थी अपको होली से संबंधित होलिका और प्रह्लाद की कहानी । आज उससे जुडी एक ऐसी कहानी सुनाऊंगी जिसके लिए ब्रज की लट्ठमार होली प्रसिद्ध है । लट्ठमार होली मुख्य रूप से ब्रज प्रदेश के साथ लगते गांव बरसाना में मनाई जाती है जिसे श्री राधा जी का जन्म-स्थल माना जाता है । यहीं पर श्री कष्ण जी नें राधा जी पर रंग डाला था और राधा जी नें अपनी सखियों के साथ मिलकर कान्हा पर लट्ठ चलाया था , तभी से यह लट्ठमार होली के नाम से प्रसिद्ध है । अरे मैं तो आपको बातें ही सुनाने लगी , यह तो बताया ही नहीं कि कान्हा नें राधा जी पर रंग क्यों डाला और राधा जी नें उन्हें लट्ठ से क्यों मारा । तो चलो सुनो इसकी भी एक कहानी ।

राधा - कष्ण की होली
प्यारे बच्चे आपको इतना तो मालूम ही होगा कि श्री कष्ण रंग के काले थी और राधा जी गोरी । राधा जी अकसर कान्हा को काला-काला कहकर चिढाती रहती और कान्हा को यह सुनकर बहुत बुरा लगता । एक बार जब राधा जी नें अपनी सखियों के साथ मिलकर कान्हा को खूब काला-काला कहकर चिढाया तो कान्हा रोते-रोते अपनी मां यशोदा जी के पास आकर बोले-
मां-मां मैं काला क्यों हूं , मुझे राधा रोज काला-काला कहकर चिढाती है । उसे अपने गोरे होने पर बहुत गुमान है ।
मां कान्हा के छोटे से मुख से ऐसी प्यारी सी भोली सी बात सुनकर भाव-विभोर हो गई और कान्हा को अंक में भर कर अत्यंत स्नेह लुटाती हुई बोली - तो जाओ तुम राधा के ऊपर रंग डाल दो तो वो भी गोरी नहीं लगेगी ।
बस मां नें तो ऐसे ही कान्हा को मनाने के लिए हंसी-मज़ाक में ही कह दिया था लेकिन कान्हा को तो बहाना मिल गया था और उसनें सभी ग्वालों को साथ लेकर राधा तथा उसकी सखियों के ऊपर चुपके से जाकर रंग डालना शुरु कर दिया । यह देख कर राधा जी और उनकी सखियों को भी क्रोध आ गया और उन्होंनें कान्हा तथा उसके सखाओं को लाठियों से पीटना शुरु कर दिया । उस दिन फ़ाल्गुन मास की पूर्णिमा का दिन था । बस तभी से यह त्योहार ब्रज में रंग-रंगीली होली और बरसाना की लट्ठमार होली के रूप में मनाया जाने लगा ।
प्यारे बच्चो त्योहार मनाने के पीछे कारण जो भी हो , उद्देश्य एक ही होता है - प्रेम-प्यार सौहार्द के साथ मिल-जुल कर रहना । यह त्योहार हमें एक दूसरे के निकट आने का अवसर प्रदान करते हैं तो मन के सारे गिले शिकवे भी दूर करने का अवसर भी प्रदान करते हैं । आओ हम सब भेद-भाव भुला मस्ती में यह पर्व मनाएं ।
आओ हम सबको रंग डालें
भेद भाव न मन में पालें
आपको लट्ठमार होली कैसी लगी , अवश्य बताना । मैं कल आपको एक और इससे जुडी कहानी सुनाऊंगी । तब तक होली मनाएं , खुश रहें ....सीमा सचदेव

24 फ़रवरी 2010

होलिका और प्रह्लाद की कहानी

नमस्कार बच्चो , होली का त्योहार और हम हाज़िर हैं आपके लिए विशेष जानकारी लेकर कि होली का त्योहार क्यों मनाया जाता है , इसके पीछे क्या मान्यता है और क्यों यह जन-जन का प्रिय त्योहार है । प्यारे बच्चो इसके साथ बहुत सी कथाएं जुडी हैं , इससे संबंधित कुछ कहानियां मैं आपको एक-एक कर सुनाऊंगी । पहले सुनिए वह कहानी जिसके साथ मुख्य रूप से यह त्योहार जोडा जाता है ।

होलिका और प्रह्लाद
एक बार एक दानव था , वह बहुत अत्याचारी था । उसका नाम था - हिरणाक्शप । वह इतना अहंकारी था कि स्वयं को भगवान से बढकर मानता था और निर्दोष लोगों का वध कर स्वयं को बलशाली कहता था । लोग उसके जुल्म से बहुत दुखी थे लेकिन क्या करते उन मासूमों की राक्षस के आगे एक न चलती ।वह तो सब से यही कहता कि बस किसी और की नहीं मेरी ही पूजा होनी चाहिए , मैं ही भगवान हूं । अगर कोई उसका विरोध करने का साहस करता तो उसको जान से ही हाथ धोना पडता । लोग डरते हुए उसकी पूजा करते । लेकिन बच्चो - अहंकार बहुत देर तक नहीं फ़लता और आखिर एक दिन उसका अंत होता ही है ।
हिरणाक्शप के साथ भी ऐसा ही हुआ -
उसका एक पुत्र था , जिसका नाम था प्रह्लाद । वह हर दम ईश्वर की भक्ति में मग्न रहता और अपने ही पिता का विरोध करता । हिरणाक्श्प बाकी सबको तो जोर-जबरदस्ती से स्वयं को भगवान मानने पर मजबूर कर देता लेकिन अपने ही बेटे का विरोध न कर पाया , और उससे अपनी बात कभी न मनवा पाता । प्रह्लाद जो बहुत छोटा सा बच्चा था अपने पिता का विरोध कर भगवान विष्णु की अनन्य उपासना करता ।
हिरणाक्श्प नें अपने पुत्र को तरह-तरह के लालच देकर बहुत समझाया लेकिन असफ़ल रहा । उसको इतना क्रोध आया कि उसने अपने ही पुत्र से प्रतिशोध लेने की ठान ली और उसे एक ऊंचे पर्वत की चोटी से नीचे गिराया लेकिन प्रह्लाद को नीचे गिरकर ऐसा लगा मानों उसे किसी नें गोदि में उठाकर झूला झुलाया हो । फ़िर प्रह्लाद को एक ऐसे कमरे में बंद कर दिया जिसमें जहरीले सांप थे लेकिन जब कुछ समय बाद कमरे का दरवाज़ा खोला गया तो उसको नागों के साथ खेलते हुए पाया , जहरीले नाग भी प्रह्लाद का कुछ न बिगाड पाए ।
यह देखकर हिरणाक्शप बहुत क्रोधित हुआ । उसके मन में तो अपने ही पुत्र के लिए बदले की भावना भरी थी । वह किसी भी तरह उसे मार देना चाहता था लेकिन उसका तो हर प्रयास असफ़ल हो रहा था ।
फ़िर उसको एक और उपाय सूझा । उसकी एक बहन थी , जिसका नाम था होलिका जिसके पास वरदान स्वरूप एक ऐसी ओढनी थी जिसे ओढ कर वह आग में भी बैठ जाए तो अग्नि उसको जला नहीं सकती थी । अपने सारे प्रयास असफ़ल देख हिरणाक्शप नें सोचा कि क्यों न प्रह्लाद को बहन होलिका की गोदि में बैठाकर आग में बैठाया जाए जिससे उसकी बहन का तो कुछ नहीं बिगडेगा लेकिन प्रह्लाद अवश्य जलकर राख हो जाएगा । बस यह विचार आते ही उसने अपनी बहन को बुलाया और उसे सब कुछ अच्छे से समझा दिया ।
होलिका नें प्रह्लाद को गोदि में उठाया और लकडियों के ढेर पर बैठ गई । नीचे से जैसे ही आग जलाई गई तो हवा का एक ऐसा झोंका आया कि उसकी ओढनी उतर कर प्रह्लाद के सिर पर आ गई और देखते ही देखते होलिका जल गई जबकि उस भयानक अग्नि में भी प्रह्लाद का बाल भी बांका न हुआ बल्कि उसे तो ऐसा महसूस हुआ जैसे वह फ़ूलों की सेज पर विश्राम कर रहा हो । यह देखकर सभी स्तब्ध रह गए । नारयण का नाम जप कर प्रह्लाद तो बच गया था , सत्य की विजय हुई थी और पाप का विनाश हुआ था । बस तभी से होली बुराईयों को जलाकर नाश करने वाला त्योहार बडी श्रद्धा , उल्लास , उत्साह से मनाया जाता है ।
बच्चो जिसके मन में सच्चाई होती है , भगवान सदैव उसका साथ देते हैं । इसलिए
मन में बैर भाव न लाना
खुशी से होली पर्व मनाना ।
रंग-रंगीली होली पर्व की ढेरों शुभ-कामनाएं । कल मैं सुनाऊंगी इससे जुडी एक और कहानी । तब तक आप अपनी परीक्षा की तैयारी कीजिए , खुश रहिए । आपकी -----सीमा सचदेव

12 फ़रवरी 2010

महा-शिवरात्रि पर्व - विशेष जानकारी

नमस्कार बच्चो ,
आज महा-शिवरात्रि पर्व है और यह पर्व पूरे भारत-वर्ष में बडी ही श्रद्धा और धूम-धाम से मनाया जाता है । लोग मंदिरों में जाकर पूजा अर्चना करते हैं , व्रत रखते हैं और पावन गंगा में स्नान कर पुण्य़ अर्जित करते हैं और आज के पावन दिन भला मैं आपको कैसे भूल सकती हूं , हां आने में थोडी देर अवश्य हो गई ।
सर्व-प्रथम तो आप सबको महा-शिवरात्रि पर्व की हार्दिक बधाई और ढेरों शुभ-कामनाएं । और अब मैं आपको बताऊंगी कि महा-शिवरात्रि पर्व क्यों मनाया जाता है ।

महा-शिवरात्रि नाम से ही ग्यात है कि यह पर्व भग्वान शिव से जुडा है । इस दिन को भग्वान शिव की विवाह गांठ के रूप में मनाया जाता है । इस दिन भग्वान शिव नें पार्वती जी संग विवाह रचा कर फ़िर से अपनी अर्धान्गिनी रूप में स्वीकार किया था । वही पार्वती जिसे उन्होंने स्वयं त्याग दिया था ।
कहते हैं एक बार भग्वान शिव और पार्वती घूमते-घूमते एक जंगल में पहुंचे , जहां भग्वान श्री राम माता सीता की खोज में इधर-उधर भटक रहे थे । भग्वान शिव नें श्री राम जी को परेशानी में देखा तो चुपचाप सिर झुका कर आगे चल दिए । पार्वती जी को भग्वान शिव का यूं सिर झुकाना अच्छा न लगा और शिव से कहा:-
"आप तो स्वयं भग्वान हो और राम एक साधारण जन , फ़िर आपने एक भग्वान होकर साधारण मनुष्य को अपना मस्तक क्यों झुकाया ।"
"भग्वान शिव नें पार्वती जी को बहुत समझाया कि स्वयं भग्वान विष्णु ही मानव रूप में श्री राम है , वो कोई साधारण जन नहीं हैं । " लेकिन पार्वती जी उनकी यह बात कहां मानने वाली थी । बस उन्होंने मन में ठान लिया कि जब तक वह श्री राम की परीक्षा नहीं ले लेती तब तक विश्वास नहीं होगा कि वह स्वयं भग्वान हैं । जब पार्वती जी किसी भी तरह शिवजी की बात मानने को तैयार नहीं हुईं तो भग्वान शिव नें पार्वती जी को श्री राम की परीक्षा लेने की अनुमति दे दी ।
पार्वती जी नें तुरंत सीता जी का रूप धारण किया और श्री राम जी के सम्मुख आ गईं ।श्री राम जो सीता की तलाश कर रहे थे , पार्वती जी को देखकर प्रणाम किया और उन्हें मां कहकर संबोधित किया तो पार्वती जी अत्यंत लज्जित हुईं । यह देखकर भग्वान शिव को क्रोध आ गया कि उनकी पत्नी किसी और का रूप कैसे धार सकती है , वो भी उसका जिसकी प्रभु शरी राम तलाश कर रहे हैं तो उन्होंने पार्वती को मन से त्याग दिया । भग्वान शिव का यूं त्याग देना पार्वती जी सह न पाईं और एक दिन अपने पिता द्वारा रचाए यग्य में अग्याग्नि में कूदकर अपने प्राण त्याग दिए और सती कहलाई । उन्होंने फ़िर दूसरा जन्म लिया और घोर तपस्या करके शिव को फ़िर से पति रूप में पा लिया । बस इसी लिए यह महा-शिवरात्रि परव भी मनाया जाता है ।

महा-शिवरात्रि पर्व की हार्दिक बधाई....सीमा सचदेव

19 जनवरी 2010

ऋतुओ की रानी

ऋतुओ की रानी

धरा पे छाई है हरियाली
खिल गई हर इक डाली डाली
नव पल्लव नव कोपल फुटती
मानो कुदरत भी है हँस दी

छाई हरियाली उपवन मे
और छाई मस्ती भी पवन मे
उडते पक्षी नीलगगन मे
नई उमन्ग छाई हर मन मे

लाल गुलाबी पीले फूल
खिले शीत नदिया के कूल
हँस दी है नन्ही सी कलियाँ
भर गई है बच्चो से गलियाँ

देखो नभ मे उडते पतन्ग
भरते नीलगगन मे रन्ग
देखो यह बसन्त मसतानी
आ गई है ऋतुओ की रानी

बसंत पंचमी की हार्दिक बधाई । आपकी - सीमा सचदेव

14 जनवरी 2010

मकर संक्रान्ति

नमस्कार बच्चो ,
कल मैं आपको लेकर गई थी पंजाब जहां लोहडी का त्योहार बहुत धूमधाम से मनाया जा रहा था और हम सबने कल खूब लड्डु और रेवडियां भी खाए थे । अब बताओ भला आज कौन सा दिन है ....? बिलकुल सही आज है मकर संक्रान्ति , इसे माघ पूर्णिमा भी कहा जाता है । आज के दिन भी घरों में कई तरह के पकवान बनाए जाते हैं , मुख्य रूप से खिचडी । तो खिचडी हम बाद में खाएंगे पहले यह तो जान लें कि यह त्योहार मनाया क्यों जाता है । इसके साथ भी अनेक कथाएं जुडी हैं । जैसे .......
१) इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने उसके घर जाते हैं । शनि क्योंकि मकर राशि के स्वामी हैं तो सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर इसे मकर संक्रान्ति कहा जाता है । इसे सूर्य वर्ष का प्रारम्भ माना जाता है ।
२) वसंत आगमन के साथ भी इस त्योहार का संबंध जोडा जाता है , सर्दी का मौसम खत्म होते ही वसंत रितु प्रारम्भ हो जाती है ।
३) इसे पतंगोत्सव भी कहा जाता है । इस दिन लोग खूब पतंगें भी उडाते हैं । पतंग उडाने के पीछे भी यही मान्यता है कि भगवान सूर्य के उत्तरायण होने पर पतंगें उडाकर उनका स्वागत किया जाता है । लोक कथा है कि भगवान श्री राम नें भी इस दिन पतंग उडाई थी और तभी से इस दिन पतंगें उडाने का प्रचलन है ।
४) इस दिन को महाभारत के महान योद्धा भीष्म पितामह की मत्यु के साथ भी जोडा जाता है । कहते हैं कि भीष्म पितामह नें अपनी मत्यु के लिए यही दिन चुना था और यह भी माना जाता है कि जिनकी मत्यु इस दिन होती है उसे फ़िर कभी जन्म नहीं लेना पडता और वह मुक्त हो जाता है ।
५) एक और मान्यता है कि इस दिन भागीरथ गंगा जी को कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए सागर तट तक लाए थे , इस लिए इस दिन गंगा स्नान का विशेष महत्त्व है । लाखों श्रद्धालु इस दिन पावन गंगा में स्नान करते हैं । लोग गंगा सागर जाकर स्नान करते हैं । इस दिन वहां श्राधालुओं की बहुत भीड होती है । तभी कहा जाता है कि -
अन्य तीर्थ बार-बार
गंगासागर एक बार
६) इसका एक भौगोलिक कारण भी है कि इस दिन के बाद दिन बडे और रातें छोटी होने लगती हैं यानि अंधेरे से प्रकाश की ओर अग्रसर होने का संकेत मिलता है । सभी प्राणियों मे नव-चेतना और नव-स्फ़ूर्ति का संचार होता है । इस लिए लोग अपने-अपने ढंग से पूजा- अर्चना करते हैं ।
७) एक पौराणिक कथा के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु नें असुरों का सिर काट कर मंदार पर्वत के नीचे दबा दिया था और धरती से नकारात्मकता का विनाश किया था ।
८) इस दिन को सुहागिनो के साथ भी जोडा जाता है । माना जाता है कि इस दिन से दिन तिल-तिल कर (थोडा-थोडा ) बढना शुरु होते हैं तो महिलाएं भी अपने पति की लम्बी आयु के लिए हल्दी कुंकुम का टीका लगाती तथा तथा की मिठाई बांट्ती हैं ।
९) मान्यता यह भी है कि भगवान श्री कष्ण जी को पाने के लिए यशोदा जी नें भी इस दिन व्रत किया था ।
१०) इसको उत्तर-प्रदेश में दान का पर्व भी कहा जाता है ।हर वर्ष १४ जनवरी को माघ मेला प्रारम्भ होता है और शिवरात्रि तक लगभग एक माह तक चलता है । इसे खिचडी पर्व भी कहा जाता है ।
११) भारतीय पंचांग चंद्रमा की गति पर आधारित होते हैं किन्तु मकर-संक्रान्ति सूर्य की गति पर आधारिर होता है , इस लिए यह हर वर्ष १४ जनवरी को ही पडता है ।
आपको पता है बच्चो कि तमिलनाडु में यह चार दिन का त्योहार मनाया जाता है । पहले दिन (भोगी पोंगल )घर का कूडा-करकट जलाया जाता है ।दूसरे दिन (सूर्य- पोंगल)लक्षमी जी की पूजा की जाती है । तीसरे दिन (मट्ठू -पोंगल)पशु धन की पूजा की जाती है तथा चौथे दिन(कन्या पोंगल) आंगन में मिट्टी के बर्तन में खीर पकाई जाती है जिसे पोंगल कहा जाता है । सूर्य को नैवेद्य देने के उपरान्त प्रसाद ग्रहण किया जाता है ।असम में मकर संक्रान्ति को माघ-बिहूया भोगाली-बिहू के नाम से मनाते हैं। राजस्थान में सुहागिन महिलाएं सुहाग की चौदह वस्तुओं का दान करती हैं ।
इस तर्ह यह त्योहार भारत के लगभग हर राज्य में अपने-अपने तरीके से मनाया जाता है ।
प्यारे बच्चो त्योहार कोई भी हो और चाहे उसे किसी भी ढंग से मनाया जाए लेकिन इसका एक मुख्य उद्देश्य होता है भाईचारा तथा प्रेम का संदेश देना । त्योहार हमारे नीरस जीवन में खुशियों का संचार तो करते ही हैं साथ में मिलजुल कर रहने और खुशियां बांट्ने का संदेश भी देते हैं तो चलिए हम भी इन खुशियों में शरीक हो जाएं और खुशी से त्योहार मनाएं ।
आप सब को मकर-संक्रान्ति की हार्दिक बधाई एवम शुभ-कामनाएं ।
आपकी
सीमा सचदेव

13 जनवरी 2010

लोहडी का त्योहार

नमस्कार ,
आज कौन सा दिन है ? आज है - लोहडी का दिन - पंजाब का सुप्रसिध त्योहार । यह त्योहार मुख्य रूप से पंजाब में बडी श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है । इस दिन लोग रेवडी , तिल के लड्डु , मुंगफ़ली , गुड और खूब सारी मिठाईयां खाते है और बांटते भी हैं । मुंह में पानी भर आया । चलो मैं आपको घुमाने ले चलती हूं पंजाब में जहां पर आज यह त्योहार मनाया जा रहा है , और आप भी मेरे साथ खूब सारे तिल के ल्ड्डु और रेवडी खाना । पर उससे पहले यह तो पता लगाएं कि यह त्योहार मनाया क्यों जाता है ।
1.दिन को लोग अपने नायक को याद करते हुए मनाते हैं और वो नायक पता है कौन था- एक डाकु । हैरान मत होना , वो एक डाकु ही था लेकिन बहुत ही विचित्र डाकु था , जिसे गरीबों का मसीहा माना जाता था और उसका नाम था - दूला भट्टी । दूला भट्टी अमीरो का खजाना लूटता और गरीबों में बांट देता , इस तरह वह गरीबों का हीरो कहलाता । एक बार उसने किसी अपहरण्कर्ता से दो लडकियों सुन्दरी और मुन्दरी को छुडवाया था और फ़िर उनका विवाह भी किया और जिस तरह एक पिता अपनी पुत्रियों को विदाई देता है वैसे ही उसने उनको सम्मान सहित अपने घर से विदा किया और उपहार स्वरूप उनको दे थी - एक सेर (किलो) शक्कर । तभी से लोग उस की याद में यह दिन मनाने लगे और इस दिन युवा लडके घर-घर जाकर लोहडी मांगते हुए गीत गाते हैं-
सुन्दर मुन्द्रिए ---हो
तेरा कौन विचारा---हो
दुल्ला भट्टी वाला------हो
दुल्ले धी व्याही-------हो
सेर शक्कर पाई------हो
कुडी दा सालु पाटा------हो
कुडी दा जीवे चाचा ----हो
इस तरह गीत गाते हुए वह पूरे गांव से लकडी , गाय के गोबर की पाथी ----आदि इक्कठा करके रात को जला कर लोहडी का त्योहार मनाते हैं ।

२. लोहडी का त्योहार सूर्य और अग्नि देव की पूजा करते हुए मनाया जाता है । पूस मास में क्योंकि ठण्डी बहुत होती है और सर्दी को भगाने के लिए अग्नि जला कर सूर्य देवता को तपिश देने की प्रार्थना की जाती है । अग्नि से क्योंकि ठण्डॆ मौसम मे राहत मिलती है तो लोग आग जलाकर मिठाईयां , रेवडियां , तिल आदि खाते हुए इसका खूब आनन्द लेते हैं ।

३. प्यारे बच्चो आपने अपनी बुक्स में पढा होगा कि प्राचीन काल में लोग अग्नि की पूजा करते थे तो लोहडी के त्योहार को उसके साथ भी जोडा जाता है । प्राचीन युग में लोग जंगलों में रहकर मांस खाकर गुजारा करते थे । पहले वह कच्चा मांस ही खाते थे लेकिन आग की खोज के बाद वह मांस को भून कर खाने लगे , इसके लिए युवा लडके-लडकियां जंगल में जाकर लकडियां चुनकर लाते थे और उसी तरह आज भी गांवों में युवा लडके-लडकियां घर-घर जाकर लोहडी मांग कर लकडियां मांग कर लाते हैं और रात को उन्हीं लकडियों से लोहडी जलाई जाती है ।

४. बच्चो इस दिन लोहडी जलाकर तिल रेवडी उसमें डाल कर बुराई को खत्म करने का संकल्प भी लिया जाता है । जितनी बुराईयां हैं वो अग्नि में जलकर भस्म हो जाती हैं और नई ऊर्जा और उत्साह मन-मस्तिष्क में भर जाती है । आल्स्य का त्याग और स्फ़ूर्ति प्रदान करने वाला यह त्योहार बडे उत्साह और धूमधाम से मनाया जाता है ।
यह त्योहार देश के अन्य राज्यों जैसे तामिलनाडु में पोंगल , असाम में बिहु आंध्रा-प्रदेश में भोगी --आदि नाम से मनाया जाता है ।
यह फ़सलों की पकाई की शुरुआत का प्रतीक भी माना जाता है ।
लेकिन समय के साथ-साथ आज इसको मनाए का तरीका बदल गया है । आज यह त्योहार फ़िल्मीं गानों की तरज़ पर नाचते गाते हुए मनाया जाता है । तो चलो हम भी अपने अंदाज में मनाएंगे और गुनगुनाएंगे



लोहडी आई लोहडी आई
तिल रेवडी साथ में लाई
ठण्डी दूर भगाएंगे
नई ऊर्जा पाएंगे
घर-घर जाकर
लकडियां लाकर
रखदें सब कुछ
चौराहे पर
शोर मचाते , गाना गाते
हाथ पकड कर सबको नचाते
लोहडी खूब जलाएंगे
मिलकर मौज मनाएंगे


चलो अब हम भी तिल के लड्डू और रेवडियां खाते हैं और लोहडी की आप सबको ढेर सारी शुभ-कामनाएं ।
आपकी
सीमा सचदेव

06 जनवरी 2010

दशम पिता श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी

नमस्कार बच्चो ,
आपको पता है कल कौन सा दिन था - कल था गुर-पूर्व । सिक्ख धर्म के दशम गुरु श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी का जन्म-दिवस । आपको संत ,सिपाही , कवि , तपस्वी और बलिदानी गुरु जी का संक्षिप्त जीवन परिचय करवाने का एक लघु प्रयास किया है काव्य-कथा के माध्यम से ,जिनके परिचय में ग्रन्थ भी लिखे जाएं तो कम ही पडेंगे ।


दशम पिता श्री गुरु गोबिन्द
माने जिनको पूरा हिन्द
नवम गुरु की जो संतान
उस जैसा न कोई महान
संत सिपाही जग रखवाला
मिटा दिया जिसने धुंध काला
सोलह शत छयासठ सन
पटना शहर हुआ पावन
मां गुजरी की गोदि में आए
सोढी गोबिन्द राय कहाए
बचपन से ही बहुत बलवान
कम आयु पर सोच महान
खेल-खेल में फ़ौज बनाते
दुश्मन से जाकर भिड जाते
सच्चाई की दिखाते राह
भरा था उनमें ग्यान अथाह
वीरता का पाठ पढाते रहते
न्याय की राह दिखाते रहते
देश और स्व कौम के हेतु
बन गए वो धर्म का सेतु
सोलह सौ पचहत्र सन
घर आए कशमीरी ब्राह्मण
नवम गुरु से की फ़रियाद
कराओ मुगलों से आजाद
जुल्म और न हम सह पाएं
कहो तो जीते जी मर जाएं
चाहिए ऐसा वीर महान
धर्म पे हो जाए जो कुर्बान
बाल गोबिन्द ने सुनी यह बात
नन्हे मन पर लगा आघात
पिता से करने लगे निवेदन
तुमसे बडा न कोई जन
धर्म की रक्षा में कुर्बान
करके बनो शहीद महान
नन्हे सुत की बात बडी
उठे नवम गुरु उसी घडी
सुत नें जो मार्ग दिखलाया
सीस दिया और धर्म बचाया
कोमल और कठोर का संगम
कवि ,वीर और अरि का यम
खालसा पंथ गुरु ने चलाया
स्वय़ं को गोबिन्द सिंह बनाया
चुनकर सभा में पांच प्यारे
दे दिए उनको रूप न्यारे
कंघा कडा केष किरपान
दे दी सिंहो को पहचान
कराया हाथ से अमत पान
सिंह सम भर दी उनमें जान
नहीं डरना न शीश झुकाना
कौम की खातिर बस मर जाना
जुल्मी का न देना साथ
सेवा में रत रखना हाथ
ऐसा गुरु नें पाठ पढाया
माना जो वो सिक्ख कहाया
जुल्म की खातिर तान के सीना
मुश्किल किया मुगलों का जीना
गढी चमकौर में हुई लडाई
दो लालों नें शहीदी पाई
हुए शहीद अजीत जुझार
फ़िर भी कभी न मानी हार
देश की खातिर मर जाएंगे
अकेले लाख से लड जाएंगे
कट जाएंगे नहीं झुकेंगे
जुल्म कभी न कोई सहेंगे
फ़तेह सिंह और जोरावर
छोटे सुत गुरु के बहादुर
जिन्दा नीवों में चिनवाया
फ़िर भी उन्होंने सिर न झुकाया
वीर पिता की वीर संतान
चारों सुत हो गए कुर्बान
आखिर में नन्देड में आए
कुछ दिन गुरु नें वहां बिताए
सरहिन्द नवाब खान वज़ीर
लगवा दिया गुरु को तीर
गुरु गोबिन्द गए सब जान
आया ईश्वर का फ़रमान
ग्रन्थ साहिब को गुरु बनाया
सब सिक्खों को हुक्म सुनाया
प्रक्ट है इसमें गुरु की देह
रखना न मन में सन्देह
मानो इसको पाओ विजय
वाहेगुरु का खालसा , वाहेगुरु की फ़तेह
गुरपूर्व की हार्दिक बधाई - सीमा सचदेव

19 अक्टूबर 2009

भैया दूज

नमस्कार बच्चो , कल खूब अच्छे पकवान खाए ,अब हमारे पावन सम्बन्धों की बात भी की । आज है दीवाली का पाँचवाँ दिन और आज का दिन "भैया दूज" के नाम से जाना जाता है। इसको यम द्वितीया भी कहते है। यह त्योहार भाई-बहन के पवित्र प्यार का प्रतीक है इस दिन बहने भाई को टीका लगाती है और उसकी लम्बी आयु की कामना करती है इस दिन के साथ भी बहुत सी कथाएँ जुडी हैं। चलो मैं आपको बताती हूँ कि इस त्योहार के साथ कौन-कौन सी कथाएँ जुडी हैं :-


१.यमराज-यमुना :-यमराज और यमुना दोनों सूर्यदेव की जुडवाँ सन्तान थे। यमुना जो कि एक पावन नदी में बदल गई और यमराज जिसको मृत्यु के देवता के नाम से जाना जाता है। कहते हैं एक बार यमुना ने अपने भाई यमराज को अपने घर बुलाया और उसकी आरती उतारी। यमराज ने खुश होकर अपनी बहन को उपहार दिए और वरदान दिया कि इस दिन जो भाई बहन के घर जाकर उसे उपहार देगा और बहन भाई का स्वागत करेगी तो उन्हें कभी यमराज ( मृत्यु ) का भय नहीं सताएगा। उस दिन क्योंकि कार्तिक मास की द्वितीय तिथि थी इस लिए इसको यम-द्वितीया भी कहा जाता है।

२.महाबलि-लक्ष्मी:- बच्चो, मैंने आपको "ओणम" की कहानी सुनाई थी कि कैसे विष्णु भगवान ने वामन रूप बना कर महाबलि राजा को पराजित किया था और उसे पाताल लोक भेज दिया था, बाद में उसे वर्ष में एक बार वापिस आने का वरदान भी दिया था। महाबलि ने एक वरदान और भी भगवान विष्णु से माँगा था कि वह पाताल लोक में जाकर हर घर में पहरेदार के रूप में हमेशा विराजमान रहे। भगवान विष्णु क्योंकि महाबलि को वरदान दे चुके थे, इस लिए उन्हें पाताल लोक में जाकर रहना पडा। यह बात श्री विष्णु पत्नी लक्ष्मी जी भला कैसे सह जाती? उन्होंने अपने पति को आज़ाद कराने का उपाय सोचा। श्रीलक्ष्मी जी एक गरीब औरत के रूप में महाबलि के पास गई और उसे अपना भाई बनाने का आग्रह किया। महाबलि ने उसे बहन स्वीकार कर लिया। लक्ष्मी जी ने महाबलि को टीका लगा कर एक बहन की तरह पूजा की और फिर जब महाबलि ने उनसे कुछ माँगने के लिए कहा तो लक्ष्मी जी ने भगवान विष्णु जी को आज़ाद करने का वरदान माँग लिया

३.श्री कृष्ण-सुभद्रा:- बच्चो, अभी मैंने दो दिन पहले आपको नरकासुर वध की कहानी भी सुनाई थी कि कैसे श्री-कृष्ण जी ने नरकासुर राक्षस का वध किया था। नरकासुर का वध करने के पश्चात श्री-कृष्ण जी सीधे अपनी बहन सुभद्रा के घर गए थे और उनकी बहन ने भाई को टीका लगाकर मिठाई और फूलों से खूब स्वागत किया था तब से यह त्योहार भैया दूज के रूप में मनाया जाता है.

४. बच्चो, इसको केवल हिन्दु धर्म में ही नहीं बल्कि जैन धर्म में भी मनाया जाता है दीवाली की जानकारी देते हुए मैंने आपको महावीर स्वामी जी के बारे में भी बताया था जब महावीर स्वामी घर-बार त्याग निर्वाण प्राप्ति हेतु निकल पड़े तो उनके भाई राजा नन्दीवर्धन जो कि अपने भाई महावीर स्वामी से बेहद प्यार करते थी, बहुत उदास हो उठे और अपने प्यारे भाई की कमी उनको खलने लगी तब उनकी बहन सुदर्शना ने अपने भाई को सहारा दिया था ।


बच्चो, यह कुछ कहानियाँ जो मैंने आपको बताई, बहन भाई के प्यार का प्रतीक है और हमें मिलजुल कर प्यार से रहने का सन्देश देते ये त्योहार या मनोरंजन के लिए नहीं बल्कि उनके पीछे छिपे सन्देशों को हमें अपने वास्तविक जीवन में अपनाना होगा तभी हम इस धरती पर स्वर्ग को भी बसा सकते है।

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भैया दूज की हार्दिक बधाई एवम शुभ-कामनाएँ सभी पाठकों को धन्यवाद......सीमा सचदेव

18 अक्टूबर 2009

गोवर्धन पूजा

नमस्कार बच्चो ,
मजे तो खूब किए न दिवाली पर ,घर मे पूजा भी की ,चलो अब कुछ पेट-पूजा भी हो जाए अगर अच्छे पकवान खाना चाहो तो चलो मेरे संग. वृन्दावन सोच कर ही मेरे मुँह मे पानी भर आया आपको पता है न कल मैने बताया था आपको कि हर वर्ष दीवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा होती है और भगवान को छप्पन भोग (५६ प्रकार के पकवान ) लगाया जाता है उत्तरी भारत मे इसे अन्नकूट के नाम से भी जाना जाता है और यह दिन विश्वकर्मा दिवस के रूप मे भी मनाया जाता है विश्वकर्मा ने बहुत सारे नगर बनाए थे ,इस लिए आज का दिन उस की याद मे मनाया जाता है हम बात कर रहे थे गोवर्धन पूजा की तो चलो आज मै आपको वो कहानी सुनाती हूँ जिसके लिए हर वर्ष गोवर्धन पर्वत की पूजा बडी धूम-धाम से की जाती है:-


गोवर्धन पूजा


बच्चो कल तो थी दिवाली
हुई थी रौशन रात भी काली
फहराया राम-लखन का ध्वज
चलो आज मेरे संग ब्रज
चलेंगें अब हम वृन्दावन
पूजा जाएगा गोवर्धन
छप्पन भोग बनेगा वहाँ पर
खाएँगे हम कान्हा संग मिलकर
आओ बताऊँ इसका राज
क्योँ पूजे जाते गिरिराज
..................
..................
पहले तो ब्रजवासी सारे
भोले-भाले थे बेचारे
करते देवराज की पूजा
ताकि खुश हो करे वो वर्षा
इन्द्र देव को होगा हर्ष
तो होगी वर्षा पूरा वर्ष
होगी चहुँ ओर हरियाली
नही रहेगी कोई कंगाली
धन -धान्य होगा अपार
छाएगी ब्रज मे भी बहार
इन्द्र देव को हुआ अभिमान
मै तो हूँ सदृश्य भगवान
देता हूँ वर्षा का धन
पलता जिस पर जन-जीवन
एक बार न हुई बरसात
ब्रज वालो को लगा आघात
सूख गए सारे ही वन
अस्त-व्यस्त हो गया जीवन
सोचा सबने एक उपाय
क्यों न वो कोई यज्ञ करवाएँ
होंगें इन्द्रदेव प्रसन्न
मिलेगा फिर वर्षा का धन
मिलके खूब पकवान बनाएँ
सुन्दर थालो मे सजाएँ
देख के कान्हा था हैरान
नही है इन्द्रदेव भगवान
न तो वो देता है धन
न दे सकता है जन-जीवन
फिर उसकी ही क्यों हो पूजा
सोचो कोई उपाय तो दूजा
फिर ब्रज वालो को समझाया
और गायों को धन बताया
इन्द्र से बडा तो है गोवर्धन
देता जो गायों को भोजन
गायों को मिलता है चारा
चलता हम सब का गुजारा
फिर हम क्यों पूजे देवराज
आओ मिलकर सारा समाज
पूजेंगें हम आज गोवर्धन
जिस पर निर्भर है यह जीवन
ब्रज वालो की समझ मे आया
गिरिराज को भोग लगाया
खुद ही कान्हा भोग लगावें
खुद गिरिराज रूप मे खावें
न जाने वो भोले ग्वाले
कान्हा हैं उनके रखवाले
आया देवराज को क्रोध
भर गया था मन मे प्रतिशोध
लगा वो खूब जल बरसाने
ब्रज को पानी मे डुबाने
जल से सारा ब्रज गया भर
देख के ब्रजवासी गए डर
कान्हा ने गिरिराज उठाया
नीचे ब्रज वालो को छुपाया
सात दिन तक हुई बरसात
पर न थका कान्हा का हाथ
मानी इन्द्र देव ने हार
आया वो कान्हा के द्वार
छोड़ दिया उसने अभिमान
बोला कान्हा है भगवान
खुद गिरिराज के रूप मे आए
खुद ही गोवर्धन को उठाए
तब से मनता है यह दिन
पूजा जाता है गोवर्धन

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गोवर्धन पूजा की हार्दिक बधाई एवम् शुभ-कामनाएँ.......सीमा सचदेव

17 अक्टूबर 2009

दीवाली /बन्दी छोड़ दिवस

दीवाली /बन्दी छोड़ दिवस
नमस्कार बच्चो,
अभी दीवाली की तैयारी तो खूब धूम-धाम से चल रही होगी। आप लोग भी खूब मजे ले रहे होंगे, तो चलो आज मैं आपको वो बाते बताऊँगी जिसके लिए यह त्योहार पूरे भारतवर्ष में विभिन्न धर्मों द्वारा बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन लक्ष्मी ,गणेश जी की पूजा की जाती है,पूरे घर में दीपक जलाए जाते हैं, सजावट की जाती है, रंगोली बनाई जाती है और खूब मिठाइयाँ और उपहार बाँटे जाते हैं

१. श्री राम जी की कहानी तो आप सब लोगों ने सुन रखी होगी कि इस दिन प्रभु श्री राम चौदह वर्ष का वनवास काट कर लक्ष्मण और सीता जी के साथ अयोध्या वापिस आए थे इस खुशी में अवधवासियों ने दीपमाला की थी तभी से यह त्योहार हिन्दू धर्म में बड़े उत्साह/उल्लास से मनाया जाता है

आपको पता है इसको जैन धर्म और सिक्ख धर्म में भी उतने धूम-धाम से मनाया जाता है

२. सिक्ख धर्म में इस दिन को "बन्दी छोड़ दिवस" भी कहा जाता है. इस दिन सिक्खों के छठें गुरु "श्री गुरु हरगोबिन्द" जी १६१९ ई. में ग्वालियर के किले से मुगल बादशाह जहाँगीर की कैद से अपने ५२ शिष्यों के साथ रिहा हो कर अमृतसर "श्री हरमन्दिर साहिब" पहुँचे थे. उनकी रिहाई की खुशी में उनके शिष्यों द्वारा धूम-धाम से खुशी मनाई गई. तभी से यह दिन सिक्ख इतिहास में "बन्दी छोड़ दिवस" के रूप में मनाया जाता है.

३. जैन धर्म में यह दिन खास महत्वपूर्ण है क्योंकि इस दिन "महावीर स्वामी "जी को निर्वाण प्रप्ति हुई थी

४. एक और बात आपको पता है पाण्डवों को भी १२ वर्ष का वनवास काटना पड़ा था और कार्तिक मास की अमावस्या की रात्रि को वो अपना वनवास पूरा कर वापिस आए थे

५.कुछ जगहों पर इसे बिजाई के त्योहार के रूप में भी मनाया जाता है

इस दिन लोगों द्वारा खूब पटाखे/फुलझड़ियाँ भी चलाए जाते है। त्योहार खुशी से मनाना चहिए। लेकिन साथ में यह ध्यान भी रहे कि कोई नुक्सान न हो। अब लोगो द्वारा कितने पटाखे चलाए जाते है और उनसे निकलने वाला जहरीला धुआँ नभ में फैलता है और वायु को दूषित कर देता है। उसी वायु में हम सब साँस लेते हैं और वही जहर हमारे अन्दर कई बीमारियों का कारण बनता है जाने-अनजाने हम अपने वातावरण को दूषित करते हैं। तो बच्चो आप दीवाली खूब धूमधाम से मनाना लेकिन अपने पर्यावरण का भी ध्यान रखना। क्यों न हम दीवाली को नए अन्दाज मे मनाएँ कुछ ऐसा सोचे कि चहुँओर खुशहाली छा जाए। आपने दीवाली कैसे मनाई मुझे बताना जरूर। यह त्योहार अधर्म पर धर्म की, अन्धेरे पर प्रकाश की विजय का त्योहार है। इस दिन सब भेद-भाव तथा नफरत को मिटा कर ही हम त्योहार का असली आनन्द ले सकते है। तो आएँ हम सब मिलकर नफरत की दीवारो को मिटा सद्-व्यवहार और सद्-विचारो का प्रकाश फैलाएँ


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दीपावली की आप सब को हार्दिक बधाई एवम शुभकामनाएं- सीमा सचदेव

16 अक्टूबर 2009

नरक चतुर्दशी / छोटी दीवाली

नमस्कार बच्चो ,
आज मैं फिर आई हूँ आपके सम्मुख एक नई कहानी और जानकारी के साथ।
आप तो जानते ही है कि दीवाली पाँच दिन का उत्सव है। कल मैंने आपको
पहले दिन "धनतेरस"की कहानी सुनाई थी आज बताऊँगी दीवाली के दूसरे
दिन का रहस्य, जिसको छोटी दीवाली भी कहा जाता है। इसके साथ बहुत सी
बाते जुड़ी है मुख्य कथा है-नरकासुर वध की इस लिए इस त्योहार को
नरक चतुर्दशी कहा जाता है। इस दिन भी लोगों द्वारा दीपक जला कर घरों
को रोशन किया जाता है, इस लिए इसे "छोटी दीवाली" भी कहते हैं।

तो यह सुनो छोटी दीवाली की कहानी:-

छोटी दीवाली की कहानी
सुनाती थी मुझे मेरी नानी
आज मैं तुम सबको सुनाऊँ
एक नया इतिहास बताऊँ
दानव था इक नरकासुर
था वो बड़ा ही ताकतवर
राज्य उसका था विशाल
पर देवों के लिए था काल
देवों पर पा ली विजय
बन गया नरकासुर अजय
देव-माता का किया अपमान
खाली कर दिए उसके कान
अदिती माँ के कुण्डल लिए छीन
किए कार्य उसने हीन
पुत्री उसकी सोलह हजार
रखा उनको अपने दरबार
उनको अपना गुलाम बनाया
साधु सन्तों को सताया
पर बच्चो यह रखना ध्यान
ज्यादा नहीं चलता अभिमान
इक दिन टूट गया अहंकार
हो गया श्री कृष्ण अवतार
नरकासुर को मार गिराया
देव-कन्याओं को बचाया
सबके संग में ब्याह रचाया
सबको अपनी रानी बनाया
देव-माता के ले लिए कुण्डल
स्वर्ग में फिर से हो गया मंगल
सबने मिलकर खुशी मनाई
छोटी दीवाली यह कहलाई

**************************************
नरकासुर प्रज्योतिश्पुर जो आजकल दक्षिण नेपाल में है का राजा था
देवों की माता का नाम अदिती था

**************************************
२. बच्चो, इस दिन के साथ और भी कथाएँ जुड़ी है आपको याद है ना
कुछ दिन पहले मैंने आपको "ओणम" की कहानी सुनाई थी

वह कहानी भी इसी दिन के साथ जुड़ी है। मैं जानती हूँ आपके मन में बहुत
से प्रश्न उठ रहे होंगे कि ओणम का त्योहार तो बहुत दिन पहले था और
"छोटी दीवाली" अब आ रही है, तो यह कहानी उससे सबंधित कैसे?
यही सोच रहे है न आप। चलो मैं आपको बताती हूँ।
इस दिन विष्णु भगवान ने वामन अवतार लेकर " राजा बलि "
का वध किया था कहानी तो आप जानते ही है लेकिन फिर दया
करके "राजा बलि " को वर्ष में एक बार वापिस आने का वरदान भी
दिया था। उसी वरदान के कारण राजा बलि वर्ष में एक बार जब
वापिस आते हैं तो "ओणम " का त्योहार मनाया जाता है
और राजा बलि का वध क्योंकि कार्तिक मास की चौदहवी तिथि को
हुआ था, इस लिए यह त्योहार दीपावली से एक दिन पहले
छोटी दीवाली के रूप में मनाया जाता है।
*****************************************

३. इस दिन के साथ एक और कथा भी सम्बन्धित है। आपने श्री राम
की कहानी तो सुनी ही होगी कि दीपावली के दिन वह चौदह वर्ष का वनवास
काट कर अयोध्या वापिस आए थे। पर क्या आपको पता है श्री राम जी ने
अपने वापिस आने से पहले हनुमान को अयोध्या अपने वापिस आने
का समचार देने हेतु भेजा था और इस दिन हनुमान ने अयोध्या
वासियों को राम के वापिस आने का समचार सुनाया था और लोगों
ने खुशी में घरों में दीपमाला की थी तभी इसको छोटी दीवाली कहा जाता है
*********************************************

४. एक और बात इस दिन हनुमान जी का जन्मोत्सव
( श्री हनुमान ज्यन्ती) भी मनाया जाता है
**********************************************

५॰ बंगाल में इसको " काली चौदस " कहा जाता है और
देवी माँ काली का जन्मोत्सव मनाया जाता है बड़े से पण्डाल
में माँ काली की मूर्ति प्रतिष्ठित कर धूमधाम से पूजा की जाती है

**************************************************

तो बच्चो, कैसी लगी आपको यह जानकारी, बताना जरूर
आप सबको छोटी दीवाली की हार्दिक बधाई एवम शुभकामनाएँ ......सीमा सचदेव


15 अक्टूबर 2009

कहानी- धन तेरस

नमस्कार बच्चो ,
अभी त्यौहारों का मौसम चल रहा है दुर्गा पूजा, दशहरा, करवा चौथ, धनतेरस, दीपावली, गोवर्धन पूजा, भैया दूज.....खूब मजे ले रहे है आप लोग। क्यों न ले आखिर हम भारत वासी हैं और हर त्योहार को उत्साह-उल्लास से मनाना तो हमारी परम्परा है। दीपावली के लिए तो आप सब ने सुन रखा होगा कि हम क्यों मनाने है?
दीपावली से दो दिन पहले "धनतेरस " का त्यौहार भी मनाया जाता है धन का अर्थ है लक्ष्मी और तेरस का अर्थ है तेरहवाँ दिन अर्थात् यह त्योहार कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की तेरहवीं तिथि को मनाया जाता है इसको धन-त्रयोदशी भी कहा जाता है आपको पता है इस दिन लोग कुछ न कुछ खरीददारी अवश्य करते हैं। मुख्य रूप से बर्तन। आजकल तो सोने और चाँदी के गहने /बर्तन खरीदने का प्रचलन बढ़ रहा है और लोग इस दिन एक-दूसरे को उपहार भी बाँटने लगे हैं। चलो आज मैं आपको वो कहानी सुनाती हूँ जिसके साथ यह त्योहार जुड़ा है :-


समुद्र मंथन
धन तेरस की सुनो कहानी
कथा बड़ी ही जानी-मानी
इन्द्र था देवलोक का भूप
अति-सुन्दर था उसका रूप
धन-धान्य था अति अपार
स्वर्ग में सजता था दरबार
हो गया उसको बहुत अभिमान
भूल गया सबका सम्मान
अहम ने उसको कर दिया अन्धा
भूल गया वो सब मर्यादा
आए इक दिन ऋषि दुर्वासा
इन्द्र से मिलने की थी आशा
पर न इन्द्र ने दिया सम्मान
हुआ ऋषि का घोर अपमान
दे दिया देवराज को श्राप
जाओ लगेगा तुमको पाप
कुछ न रहेगा तेरे पास
यह मेरा है अटल अभिशाप
अब तो इन्द्र लगा पछताने
भूल पे अपनी आँसू बहाने
दानवों को अब मिल गया मौका
दे दिया देवराज को धोखा
लिया उन्होंने स्वर्ग को जीत
इन्द्र का सुख बन गया अतीत
हो गया उसका चेहरा मलीन
बन गया वो राजा से दीन
धनवंतरि
गए यूँ बीत बहुत से साल
आया वृहस्पति को ख्याल
क्यों न वह कोई करे उपाय
देवराज का कष्ट मिटाए
गया ब्रह्म विष्णु के पास
बोला मैं हूँ बहुत उदास
दुखी बड़ा है मेरा शिष्य
उज्ज्वल कर दो उसका भविष्य
सोचा उन्होंने एक उपाय
जो सागर मन्थन किया जाए
अमृत उसमें से निकलेगा
जो कोई उसका पान करेगा
हो जाएगा वह अमर
नहीं रहेगा फिर कोई डर
फिर से इन्द्र को मिलेगा राज
पर अति कठिन है यह सब काज
जो असुरों का मिल जाए साथ
तो बन जाए बिगड़ी बात
वृहस्पति ने दानवों को बुलाया
और अमृत का राज बताया
लालच में दानव आ गए
देवों के संग में मिल गए
मन्दराचल पर्वत को लाए
वासुकि नाग को रस्सी बनाए
मन्दराचल की बनी मथानी
मथने लगे सागर का पानी
सर्व-प्रथम निकला कालकुट
पी गए उसको जटा जुट
गले में अपने विष को दबाए
तभी शिव नील-कण्ठ कहलाए
उच्चश्रवा घोड़ा फिर आया
कल्पवृक्ष देवों ने पाया
कामधेनु गाय भी आई
उनके साथ फिर लक्ष्मी आई
आखिर में धनवन्तरि आया
अमृत कलश हाथों में उठाया
देव-दानवों का मन ललचाया
विष्णु ने मोहोनी रूप बनाया
अमृत देवों को पिलाया
स्वर्ग उन्हें वापिस दिलवाया
तेज इन्द्र ने फिर से पाया
दुर्वासा का श्राप मिटाया
***************************************
प्यारे बच्चो, "धनवन्तरि " को देवों का वैद्य भी कहा जाता है क्योंकि उसी के दिए अमृत
से देवो को अमरता और इन्द्र को अपना खोया तेज़ वापिस मिला था

***************************************
धनतेरस की सभी को हार्दिक बधाई एवम शुभ-कामनाएँ---सीमा सचदेव

05 अगस्त 2009

राखी का गीत -आचार्य संजीव 'सलिल'

राखी का गीत

आचार्य संजीव 'सलिल'

मेरा प्यारा भैया राजा...

थोडा सीधा, थोडा नटखट.

उठे खेलने लगता झटपट.

मैया कहती- 'करो पढ़ाई'

तब आती है निंदिया चटपट.

मुझको आता इस पर प्यार.

मैं जाऊँ इस पर बलिहार.

आ राखी बँधवाने आजा.

मेरा प्यारा भैया राजा...

*****

बहुत दुलारी मेरी बहना.

हिल-मिल साथ हमें है रहना.

आँच न इस पर आने दूँगा.

कष्ट पड़े कितने भी सहना.

राखी और मिठाई लाई.

मैं तो दूँगा गुडिया भाई.

मानूँगा मैं इसका कहना

बहुत दुलारी मेरी बहना...

******

भाई-बहिन मिल नाचें-गायें

राखी का त्यौहार मनायें.

माँ की आँखों के दो तारे

हर अँधियारे, दें उजियारे.

सावन-वर्षा दें आनंद,

नन्हा मन झूमे सानंद.

'सलिल' संग घूमें मुस्कायें.

राखी का त्यौहार मनायें...

**********

03 अप्रैल 2009

श्री राम-कथाकाव्य

आया बच्चो चैत्र मास
नवमी का दिन इसमे खास
प्रभु श्री राम का हुआ जन्म
माने इसको हिन्दु धर्म
अवध नगर के राजा दशरथ
चार हुए उनके प्यारे सुत
राम लखन और भरत शत्रुघ्न
चारों ही अनमोल रत्न
चारों पिता के आज्ञाकारी
खुश थी उनसे परजा सारी
गुरु आश्रम मे शिक्षा पूरी
आशा न थी कोई अधूरी
कई राक्षसों का किया संहार
मिटाया भू पर अत्याचार
तभी तो राम आदर्श कहाए
स्वयं प्रभु धरती पर आए
तारी पाहन बनी अहिल्या
धन्य थी माता कौशल्या
शिव धनु तोड के ब्याह रचाया
जनक दुलारी को अपनाया
सजना था जब अवध का ताज
माता कैकेयी हुई नाराज
मांग लिए उसने दो वचन
भूप भरत और राम को वन
हँस कर माँ का रक्खा मान
पिता के पूरे इए वरदान
सिया लखन को संग लिवाय
वन मे चौदह वर्ष बिताए
हर ली जब रावण ने सीता
तो जाकर लंका को जीता
फिर से अवध जब वापस आए
तो फिर राजा राम कहाए
कुछ समय तो सुख से बिताया
इक धोबी ने कह सुनाया
रक्षा करो राजा के मान की
तज दो अपनी पत्नी जानकी
रावण कैद मे रहकर आई
नहीं बन सकती वो राजमाई
दुविधा हुई राजा को खास
दे दिया पत्नी को वनवास
दो पुत्रों के बने पिता
लव-कुश की माता थी सीता
वाल्मीकि आश्रम में रहकर
जीवन में कष्टों को सहकर
बडेहुए थे दोनों सुत
शक्ति उनमें थी अदभुत
एक बार राम से भी टकराए
पर कोई भी हार न पाए
तब श्री राम ने राज यह जाना
अपने पुत्रों को पहचाना
पत्नी त्याग पर पश्चाताप
राम तो करने लगे विलाप
पर सीता धरती माँ जाई
माँ की गोदि में ई समाई
लव-कुश को दे अवध का राज
त्याग दिया प्रभु ने सब काज
जाकर स्वयं वो जल में समाए
महामानव वो जग मे कहाए
मर्यादा पुरुषोत्तम राम
सदा रहेगा जग में नाम

राम नवमी की आप सबको ढेरों शुभ-कामनाएं एवम हार्दिक बधाई

पढ़ने वाले भैय्या, अँकल जी और आँटी जी,
आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
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