नन्हा मन

बच्चों, बहुत खोजबीन के बाद, अचपन जी ने नन्हा मन पर उड़न तश्तरी उतारने में सफलता पाई ! देखा ? तो.. सी-बॉक्स में अपनी प्रतिक्रिया दो !
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02 मई 2012

चूचू और चिण्टी ( बाल-उपन्यास भाग-5)

नमस्कार बच्चो ,
                          आपको याद होगा मैं आपके लिए लाई थी बाल-उपन्यास चूचू और चिण्टी , उसका अगला भाग यहां पढ़िए -

चूचू और चिण्टी ( बाल-उपन्यास भाग-1)
चूचू और चिण्टी ( बाल-उपन्यास भाग-2)
चूचू और चिण्टी ( बाल-उपन्यास भाग-3)
चूचू और चिण्टी ( बाल-उपन्यास भाग-4)

माता-पिता भी गए
सोचा छूटे इनका संग
तब ही दोनों समझ पाएंगे
जब साथ ये रह पाएंगे
जब दोनों साथ रहेंगे
कैसे इक दूजे से लडेंगे
देने को दोनों को अक्ल
भेज दिया चिण्टी को होस्टल
रह गया चूचू अब अकेला
पर वह किसी संग खेला
बात करता किसी से खास
चिंटी रहने लगी उदास
किसी से वह भी बतियाती
मन ही मन बहुत पछ्ताती
चिंटु भी मन में पछताया
दोषी स्वयं को ही बस पाया
आया वह चिंटी के घर
कहने लगा चूचू रोकर
अब कभी चिंटी से लडुंगा
जो बोलोगे वही करुंगा
पर चिंटी को वापिस बुलाओ



या मुझे होस्टल में भिजवाओ
कैसे रहेगी चिंटी अकेली
वहां उसकी कोई सहेली
चिंटी को भी समझ में आई
चूचू के घर चिट्ठी पाई
माफ़ करो मेरी नादानी
मैं ही सबको पहचानी
अब मुझको हुआ अहसास
अपने होते कितने खास
अब चूचू संग लडुंगी
जो कहोगे वही करुंगी


 

23 सितंबर 2010

मैं गणेश

मैं गणेश , सबसे विशेष 
जो समझो , वो मेरा वेष 
मैं कण-कण में डाल-डाल में 
आता हूं कुछ दिन साल में 
मिलता मुझको स्नेह अपार 
कितना करें सब मुझसे प्यार 
हर्षित हो जाता है मन 
खुश करता हूं मैं हर जन 
इस प्यार में मैं झुक जाता हूं 
हर मन में मैं बस जाता हूं 
पर मेरा भी दुखता मन
होता जब मेरा विसर्जन 
एक तो लम्बा फ़िर वियोग 
साल बाद होगा संयोग 
ऊपर से फ़ैले प्रदूषण 
जिस पर पलता सबका जीवन 
गंदला हो जाता वह जल 
जिस पर रहे हैं जंतु पल 
मुझ पर जो सबनें रंग डाले 
हैं वो सब कैमिकल वाले
मैं न कुछ समझा सकता हूं 
कैसे सम्मुख आ सकता हूं 
देख के श्रद्धा और प्यार 
मैं भी करता हूं विचार 
कैसे मैं सबको समझाऊं 
रंगों के नुकसान बताऊं 
मैं देव , फ़िर भी असहाय 
कोई तो आ सबको समझाय 
करो मुझे जी भर कर प्यार 
पर थोडा सा करो विचार 
कितना जल गंदा करते हो 
जिस के बल पर सब पलते हो 
रंग जहरीले जल में जाएं 
कितने जल जन्तु मर जाएं 
फ़ैल जाए जल में महामारी 
जिससे फ़लती है बीमारी 
बिन समझे क्यों करते पाप 
दोषी क्यों खुद बनते आप 
स्व खुशी पर का नुकसान 
ये न मेरा है अरमान 
बिन रंगों के मुझे सजाओ 
या फ़िर धातु से बनवाओ 
जो रंगों से मुझे सजाओ 
तो फ़िर घर पर ही बैठाओ 
रहुंगा फ़िर मैं हरदम पास 
जो सब मेरा करो विश्वास 
वातावरण जो होगा स्वच्छ  
मिलेगा तुम सबको भी यश 
करो न कुदरत से खिलवाड 
जो दोगे तुम इसे बिगाड 
तो फ़िर बिगडेगा जन जीवन 
कैसे हर्षित होगा मन ?
कुदरत से जो करते प्यार 
उसे मैं देता खुशी अपार 
समझो कुछ मेरा भी वेदन 
साफ़ रखो कुदरत का धन 
तो मैं खुशी से आऊंगा 
हर मन में बस जाऊंगा ।

गणेशोत्सव की सबको बधाई......सीमा सचदेव

18 सितंबर 2010

चूहा बिल्ली दोस्त बने


चूहा बिल्ली दोस्त बने
दोनों खाने लगे चने
बिल्ली चूहे को घुमाती
पीठ के ऊपर उसे बैठाती

चूहा लेकर आता दाने
बिल्ली का सब कहना माने
रह्ते दोनों हरदम पास
हुआ इक दूजे पर विश्वास

फ़ैल गई जंगल में कहानी
कहते सब इसको नादानी
मिलकर सब जीवों नें उनको
समझाने की ठानी

चूहे के घर सांप गया और
बिल्ली के घर शेर
तोडो इक दूजे से नाता
लाओ जरा न देर

छोडी दोनों नें ही यारी
और तोडा विश्वास
अब चूहा और बिल्ली दोनों
आते कभी न पास

चित्रकार- शुभम सचदेव

09 सितंबर 2010

चूचू और चिण्टी ( बाल-उपन्यास भाग-4)

चूचू और चिण्टी ( बाल-उपन्यास भाग-1)
चूचू और चिण्टी ( बाल-उपन्यास भाग-2)
चूचू और चिण्टी ( बाल-उपन्यास भाग-3)


चिण्टी-चूचू खूब झगडते
हर जगह पर हल्ला करते
दोनों बच्चे बडे नादान
सब रहते उनसे परेशान
पर दोनों ही थे होशियार
लडते पर करते थे प्यार
टीचर दोनों को समझाती
नैतिकता का पाठ पढाती
मानते टीचर का हर कहना
पर छोडे कभी झगडना
देते इक दूजे का साथ
पर जाने क्या थी बात ?
बात-बात पर दोनों लडते
पर इक-दूजे बिन रहते
इक दिन हुई कुछ ऐसी बात
छूट गया दोनों का साथ


************************

05 अगस्त 2010

चूचू और चिण्टी ( बाल-उपन्यास भाग-3)


चूचू खाने का दीवाना
खा जाता चिण्टी का खाना
चोरी से वह खाना खाए
चिण्टी भूखी ही रह जाए
बातों में चिण्टी को लगाता
टिफ़न चुपके से उठाता
लेकर खाना भर दे घास
रखदे फ़िर चिण्टी के पास
होती जब खाने की छुट्टी
चूचू खाए मजे से रोटी
देखती रह जाए उसको चिण्टी
इतने में बज जाए घण्टी
दूर से चूचू बडा चिढाता
पास कभी चिण्टी के आता
कहता खालो कुछ तो मिठाई
आज जो तुम टिफ़न में लाई
स्कूल से हो जाओगी लेट
भर लो कुछ तो अपना पेट
नहीं तो खालो मेरा खाना
जूठा है पर घबराना
सुनकर चिण्टी पटके पैर
अब चूचू की नहीं है खैर
पकड के खींचे उसके बाल
हो जाए कक्षा में धमाल
लातें मुक्के घूसा चलाएं
दोनों की शामत जाए

12 जुलाई 2010

चूचू और चिण्टी ( बाल-उपन्यास भाग-2)

चूचू जब भी पढने जाए
चुपके से चिण्टी वहां आए
करदे रूम की बत्ती बन्द
छुप कर लेने लगे आनन्द
अंधियारे में करे शैतानी
कॊपी पर वो डाले पानी
दबे पांव बाहर को जाए
कोई भी उसको देख पाए
कभी छुपा ले उसकी किताब
करदे बस्ता कभी खराब
गह कार्य की कॊपी छुपाए
चूचू को डांट पड जाए
कभी किसी की चीज उठाती
बैग में चूचू के रख आती
चूचू को कहते सब चोर
मच जाता कक्षा में शोर

07 जुलाई 2010

चूचू और चिण्टी ( बाल-उपन्यास भाग-1)


नमस्कार बच्चो ,
आज से आप पढेंगे बाल-उपन्यास काव्य शैली में चूचू और चिण्टी ।
















चूचू और चिण्टी की यारी
जोडी कितनी प्यारी -प्यारी
दोनों छोटे नन्हे बच्चे
पर थोडे से अक्ल के कच्चे
चूचू हर पल करे शैतानी
चिण्टी चूचू की भी नानी
चिण्टी जब भी सोने जाए
चूचू उसको बडा सताए
जाकर उसके कान खुजाता
और फ़िर धीरे से छुप जाता
भाग जाए कभी च्यूंटी काट
कभी पीठ पर मारे लात
देता उस पर पानी डाल
कभी खींचता उसके गाल
उसे चिढाने में मजा आए
चिंटी को निद्रा से जगाए
चिंटी उसके पीछे भागे
तो घर वाले सारे जागें
मच जाए घर में ऐसे शोर
आया हो ज्यों कोई चोर
धमा चौंकडी और हो हल्ला
लगे पकडने पूरा मुहल्ला

22 जून 2010

हितोपदेश 23 - दो बिल्लियां और बंदर

दो बिल्लियां रहतीं इक साथ
चाहे दिन हो चाहे रात
साथ में दोनों घूमने जातीं
मिलकर अपना समय बितातीं
एक बार वो घर से निकलीं
थी वो दोनों बहुत ही भूखी
दिख गई उनको रोटी एक
खोया दोनों ने विवेक
मेरी मेरी करके झगडने
दोनों लगीं आपस में लडने
इतने में इक बंदर आया
उन दोनों को पास बुलाया
देख के उनके पास में रोटी
बंदर की हुई नियत खोटी
लगा वो दोनों को समझाने
प्रेम-प्यार का पाठ पढाने
आपस में तुम कभी न लडना
रोटी आधी-आधी करना
मानो जो तुम मेरी बात
रोटी दे दो मेरे हाथ
आधी-आधी करके दूँगा
दोनों से इन्साफ करूंगा
मानी बिल्लियों ने यह बात
दी रोटी बंदर के हाथ
थी बंदर की नियत खोटी
दो टुकडों में बांटी रोटी
एक बडा इक छोटा टुकडा
हुआ बिल्लियों में फ़िर से झगडा
बंदर ने तो की चतुराई
तोड के रोटी खुद ही खाई
बंदर ने खा लिया निवाला
छोटा हुआ टुकडा बडे वाला
दोनों टुकडे नहीं बराबर
करूं सम कुछ रोटी खाकर
दूसरे टुकडे से भी खाई
बिल्लियों को पर समझ न आई
पूरी रोटी खा गया बंदर
भाग गया झट से तरु पर
मजे से उसने खाया खाना
पर बिल्लियों को पडा पछताना
...................
जो न वो आपस में झगडतीं
रोटी आधी आधी करतीं
आधा आधा पेट तो भरता
बंदर चलाकी न करता

20 जून 2010

कितने तुम अच्छे पापा

पापा कितने सच्चे तुम


हो क्यों इतने अच्छे तुम ?

कभी मैं गुस्सा हो जाऊं

प्यार से मुझे मनाते तुम

ढेरों खिलौने लाते हो

मुझ संग बच्चे बन जाते हो

जब भी कभी मैं गिर जाऊं

क्यों गुस्सा हो जाते हो ?

मेरी थोडी सी पीडा

तुम क्यों न सह पाते हो ?

अपने प्यारे हाथों से

मेरी पीडा सहलाते हो

मेरे लिए गाते गाना

कभी घोडा बन जाते हो ?

कभी घुमाने ले जाते

तो सच्चे दोस्त बन जाते

रखते मेरा कितना ध्यान

कितने मुझे पर हैं अरमान

तेरी आंखो के सपने

लगते हैं मुझको अपने

गुस्सा कभी दिखाते हो

उसमें भी प्यार जताते हो

ज्यों हो तुम बच्चे पापा

कितने तुम अच्छे पापा

16 जून 2010

सच्चा सपूत - baal-kavita

देश का प्रेम भरा हो जिसमें


देश-भक्त कहलाता है ,

जो भावों से भरा हुआ हो

देश भक्ति लिख पाता है ।

अपनी मां अपनी मिट्टी से

जिसका गहरा नाता हो

बलिदानी वीरों सम्मुख

जो नत-मस्तक हो जाता हो

अपने वतन लिए अपने

लिख-लिख कर भाव बहाता हो

कुर्बानी सुन-सुन जिसके

नयनों से गंगा बह जाए

अपनी मिट्टी की खुशबू से

जो जन दूर न रह पाए

जिसकी कलम वीर-गाथा में

स्वयंमेव लिखती जाए

पढ-सुनकर जिसको ह्रदय

भी भाव-विह्वल हो जाता है

वही सच्चा मां का सेवक

सच में सपूत कहलाता है

14 जून 2010

कान्हा की बाल-लीलाएं-6 ( ब्रह्मण्ड दिखाना )

जब कान्हा बहुत छोटे थे तो बाल-स्वभाव वश वो भी मिट्टी खाते थे । मां उनको बहुत समझाती पर कान्हा मां के डर से छुप-छुपकर मिट्टी खाने लगे ।

एक बार कान्हा जब सबसे चोरी छुप-छुपकर मिट्टी खा रहे थे तो उन्हें दाऊ भैया नें देख लिया और पकड कर मां के पास ले आए । मुंह पर मिट्टी लगी देख मां को बहुत

क्रोध आया और कान्हा से डांटते हुए बोलीं "क्यों रे कान्हा तैने माटी क्यों खाई"

नहीं मां मैने माटी नहीं खाई ( कान्हा ने मां से झूट बोलते हुए कहा )

अच्छा माटी नहीं खाई , जरा मुंह तो खोलो ।

बस मां के कहने की देर थी कि कान्हा नें झट से अपना छोटा सा मुंह पूरा खोल दिया और मां यशोदा को मुंह में मिट्टी की बजाय पूरी दुनिया घूमती हुई दिखाई दी । यह देखकर तो मां कुछ समझ ही नहीं पाई और वहीं पर बेहोश होकर गिर पडी ।

जब कान्हा थे नन्हे बाल

करते कोई न कोई कमाल

सबसे छुप कर मिट्टी खाते

मां जसुमति को झूट बताते

एक बार बल भाई नें देखा

मुंह में था मिट्टी का गोला

धीरे-धीरे लगे चबाने

और सबकी नजरों से छुपाने

मां के पास पकड कर लाए

सब कुछ आकर दिया बताए

सुनकर मां को गुस्सा आया

कान्हा नें मुंह खोल दिखाया

सष्टि मुंह में घूमती पाई

मां ने अपनी सुध गवाई

ऐसी कान्हा नें की लीला

मां जसुदा को सब कुछ भूला

कान्हा की बाल-लीलाएं-5  , कान्हा की बाल-लीलाएं-4  , कान्हा की बाल-लीलाएं-3  , कान्हा की बाल-लीलाएं-2 , कान्हा की बाल-लीलाएं-1

11 जून 2010

बाल-श्रम को जड से मिटाएं - poem

नमस्कार बच्चो ,


क्या आपको पता है कल विश्व बाल-श्रम रोको दिवस है । दुनिया भर में लाखों ऐसे बच्चे हैं जिन्हें अपने बचपन को भुला कहीं न कहीं काम करना पडता है । ऐसे बच्चों को भी अपना बचपन पूरा जीने का हक है । चलो हम भी ऐसे नन्हे-मुन्ने प्यारे-प्यारे बचपन को संवारने में अपनी आवाज़ उठाएं और बाल-श्रम जैसी भयानक सामाजिक बीमारी को जड से मिटाने में अपना सहयोग दें |

 

बच्चे जग की बडी नियामत

ऐसी भी क्या आई कयामत

इनके नन्हे-नन्हे हाथ

करते रहें काम दिन रात

जूठन मांजें जूठन खाएं

खेल कूद मस्ती को भुलाएं

कभी खडे हो सडक किनारे

माल बेचने लगें बेचारे

कभी करते ये जूते साफ़

ये कैसा इन संग इंसाफ़ ?

बेचें फ़ल पर खुद न खाएं

बोझा कंधों पर उठाएं

कभी भीख में हाथ बढाएं

खेतों में जा काम कराएं

कहां खो गया इनका बचपन ?

मरा हुआ क्यों इनका मन ?

भोलेपन पर भारी काम

बचपन में भी नहीं आराम

नींद चैन और खेल भी खोया

छुप-छुप कर ये कितना रोया

क्यों न किसी नें इनको जाना

प्यारा बचपन न पहचाना

स्कूल और दोस्तों से दूर

क्यों भाग्य इनका क्रूर

आओ मिल अभियान चलाएं

बाल-श्रम को जड से मिटाएं

खो न जाए इनका बचपन

न रोए कोई नन्हामन

भर जाए खुशियों से बचपन

दुनिया का अनमोल रत्न

खो न जाए बाल-मुस्कान

दबें नहीं इनके अरमान

आओ मिलकर करें विचार

इन बच्चों की सुनें पुकार

जीने का इन्हें भी अधिकार

न हो बचपन का तिरस्कार

गया बचपन न लौट के आए

आओ हम बचपन को बचाएं

बाल-श्रम को जड से मिटाएं

आओ मिल अभियान चलाएं

कान्हा की बाल-लीलाएं-5 ( पूतना वध )

इधर कान्हा तो नन्द-बाबा और यशोदा मैया के घर गोकुल में रहने लगे लेकिन उधर कंस को पता चला कि देवकी का आठवां पुत्र श्री कष्ण है तो उसने श्री कष्ण को मारने के कई प्रयत्न किए । एक बार उसने पूतना राक्षसी को कान्हा को किसी भी तरह से मार देने के लिए गोकुल भेजा । पूतना अपना वेश बदलकर गोकुल में आई और कान्हा को धोखे से उठाकर आसमान में उडने लगी । यह देखकर सब ब्रजवासी डर गए लेकिन नन्हें से दूधमुंहे कान्हा नें पूतना को अपने नन्हें हाथों से ही मार गिराया और स्वय़ं उसके ऊपर बैठकर ऐसे खेलने लगे जैसे कुछ हुआ ही नहीं । यह देखकर सब हैरान थे । कान्हा को सुरक्षित देखकर मां यशोदा और बाबा नन्द उसकी नजर उतारने लगे और ईश्वर को धन्यवाद देने लगे ।

उधर कंस नें जाना राज

देवकी सुत ही है ब्रजराज

जिन्दा है अभी उसका काल

ब्रज में रहता है बन ग्वाल 


पूतना राक्षसी को बुलवाया

सारा किस्सा उसे सुनाया

किसी तरह कान्हा को मार

करदो कुछ मेरा उद्धार

सुन पूतना नें बदला वेश

झट से पहुंची ब्रज प्रदेश

धोखे से कान्हा को लेकर

पहुंची नभ में वो उडकर

बल  नन्हें कान्हा नें दिखया

 धरती पे पूतना को गिराया

गिरते ही उसने दम तोडा

तभी कान्हा नें उसको छोडा

लगे खेलने उसपर ऐसे

रेत के टीले पर हों जैसे ।

05 जून 2010

कान्हा की बाल-लीलाएं-4

मैया यशोदा जी की गोदि में आकर कान्हा वहीं पर पलने लगे । कोई भी यह न समझ पाया कि कान्हा तो स्वयं भगवान हैं । वे गोप-ग्वालों के संग मिलकर खेलते और खेल खेल में ही अपनी लीला भी दिखाते ।मां जसोदा का लाडला और बाबा नन्द की आंखों का तारा जो संपूर्ण स्र्ष्टि का मालिक , वही गोकुल में गाय चराता । जो पूरी दुनिया को देने वाला है वही गोपियों के घर जाकर उनका दही माखन खाता । कभी यमुना तट पर रास रचाता तो कभी मुरली की मधुर तान से सब का मन मोह लेता ।


कभी इधर -उधर छुप कर मां को खूब सताता तो कभी चोरी से मिट्टी खाता ।उसकी लीला कभी कोई समझ नही पाता , बस वह अपनी बातों ही से सब का मन मोह लेता ।

मां जसुदा की गोदि में आकर

तरह तरह के खेल दिखाकर

गोप-ग्वालों को गले लगाए

खेल खेल में खेल दिखाए

मां जसुदा का राज-दुलारा

बाबा की आंखों का तारा ।
तीन लोक का नाथ कहावे

गोकुल में जा गाय चरावे

जो सारी सष्टि का दाता

दही माखन गोकुल में चुराता

यमुना तट पर रास रचावे

मुरली बजा कर सबको रिझावे

छुप-छुप कर कभी मां को सताए

कभी चोरी से मिट्टी खाए

लीला उसकी समझ न आए

बातों ही से सबको रिझाए ।
 
कान्हा की बाल-लीलाएं-1
कान्हा की बाल-लीलाएं-2
कान्हा की बाल-लीलाएं-3

12 मई 2010

कान्हा की बाल-लीलाएं-3

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गोकुल में मुझे छोड के आओ

नन्द बाबा की कन्या लाओ

सूप में कान्हा को लिया डाल

चला वासुदेव धीमी सी चाल

बाहर वर्षा और तूफ़ान

सिर पर बैठे स्वयं भगवान

शान्त चित्त मन में विश्वास

पहुंचा जब यमुना के पास

तेज़ धार और पानी गहरा

पर न इक पल भी वो ठहरा

चलने लगा नदी के अंदर

चले कमल ज्यों कोई जल पर

नाग एक यह देख के आया

आकर अपना फ़ण फ़ैलाया

प्रभु के ऊपर करदी छाया

वर्षा से कान्हा को बचाया

पर गहरा यमुना का जल

छूट रहा पैरों से तल

लगा अभी ही बह जाएगा

सुत को नहीं बचा पाएगा

पर कान्हा के चरण कमल

छूकर नीचे आया जल

पार हुए सरिता को ऐसे

फ़ूल बिछे हों पथ पर जैसे

कान्हा को सिर पर उठाए

वासुदेव नन्द के घर आए

कान्हा छोड कन्या को उठाया

माया नें क्या खेल रचाया

किसी को भी न हुई खबर

आ गए कान्हा नन्द के घर
 
 
जन्म लेते ही श्री कष्ण नें अपने पिता से उसे गोकुल नन्द बाबा
के घर छोडकर आने तथा उनकी क्न्या को उठाकर लाने को कहा । वासुदेव नें श्री कष्ण को एक सूप में डाला और गोकुल की तरफ़ चल दिए । चलते हुए ऐसा प्रतीत हुआ मानो स्वयं प्रभु उसको बांह पकडकर ले जा रहे हैं । मथुरा से गोकुल जाने के लिए वासुदेव को जमुना नदी को पार करना था और वर्षा के कारण यमुना नदी में पानी बहुत तेज गति से बह रहा था लेकिन वासुदेव को तो जैसे सुध ही न थी वह बिना इसकी प्रवाह किए नदी में घुस गया । वासुदेव ने सूप को सिर पर रखा और नदी पार करने लगा । पानी वासुदेव के सिर तक आ गया था लेकिन फ़िर भी वह चलते जा रहा था । ऊपर से वर्षा हो रही थी । नदी में एक नाग ने प्रभु श्री कष्ण को देखा और उन्हें भीगने से बचाने के लिए ऊपर आ कर अपना फ़ण फ़ैला लिया और जब प्रभु श्री कष्ण नें देखा कि यमुना नदी में अब वासुदेव के लिए चलना कठिन हो गया है तो उन्होंने अपना एक पैर सूप में से बाहर निकाला और यमुना जल को जैसे ही छुआ , नदी का पानी अपने आप नीचे हो गया । वासुदेव नें नदी पार की । गोकुल पहुंचकर नन्द बाबा के घर देखा कि सब लोग सो रहे थी । वहां उनके घर कन्या का जन्म हुआ था । वासुदेव नें श्री कष्ण जी को यशोदा जी के पास लेटा दिया और उनकी कन्या को उठा कर वापिस चल दिए ।
इस तरह श्री कष्ण नन्द बाबा के घर गोकुल में आ गए ।

05 मई 2010

कान्हा की बाल-लीलाएं-2

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जेल में देवकी और वासुदेव

जपते रहते हरि सदैव

एक- एक हुए सुत सात

सौंप दिए सब कंस के हाथ

वासुदेव नें वचन निभाया

कंस नें उनको मार मुकाया

अब थी आठवें सुत की बारी

कर ली कंस नें खूब तैयारी

किसी तरह बाहर न जाए

जन्मते ही मेरे हाथ में आए

जब उसको दूंगा मै मार

तभी हटेगा मन का भार

कष्ण पक्ष और भाद्र मास

आ गया बच्चो दिन वो खास

जब कान्हा ने लिया जन्म

मिट गया सब धरा का तम



कारी अंधियारी थी रात
ऊपर से हो रही बरसात

सो गए सारे पहरेदार

खुल गए स्वयं जेल के द्वार

चतुर्भुज रूप प्रभु नें दिखाया

माता-पिता को फ़िर समझाया

देवकी और वासुदेव दोनों कारागार में रहकर हर समय प्रभु की भक्ति करते रहते । वहीं पर उनके सात पुत्र पैदा हुए जिन्हे कंस नें बडी ही बेरहमी से मार दिया ।अब आठवें पुत्र का ज्न्म होने वाला था , जिसका कंस को वर्षों से इंतजार था । उसने कारागार के पहरे और कडे कर दिए और इंतजार करने लगा कि कब देवकी का आठवां पुत्र पैदा हो , कब वह उसको खत्म करके अपने काल को समाप्त करदे । फ़िर वह

निश्चिन्त जीवन जी पाएगा । आखिर भाद्र माह के कष्ण पक्ष की आठवीं तिथि को भगवान श्री कष्ण जी का जन्म हुआ । जिसका कंस को बेसब्री से इंतजार था वह दिन आ गया था । उसे तो अपने काल का विनाश करना था लेकिन विधाता नें तो उसके भाग्य में कुछ और ही लिख रखा था । तेज आंधी तूफ़ान काली अंधियारी रात में श्री कष्ण जी का जन्म हुआ और जन्म

लेते ही जेल के ताले अपने आप खुल गए , सभी पहरेदार गहरी निद्रा में सो गए । प्रभु श्री कष्ण नें जन्म लेते ही अपनी माया का ऐसा जाल फ़ैलाया कि किसी को कोई सुध ही न रही । समय जैसे थम सा गया । काली अंधियारी आधी रात में प्रक्ट होकर प्रभु नें अपनी माता-पिता को अपना चतुर्भुज रूप दिखाया ।


26 अप्रैल 2010

शेर और बिल्ली

एक बार जंगल का शेर
भूखा बैठा कितनी देर
फँसा नही था कोई शिकार
हो गया शेर बहुत लाचार
कैसे अपनी भूख मिटाए ?
कैसे वह कोई जानवर खाए ?
देखी उसने बिल्ली एक
चूहे खाये थे जिसने अनेक
भर गया शेर के मुँह मे पानी
सोची उसने एक शैतानी
बैठ के अपने मन में विचारा
खाए बिना अब नहीं गुजारा
किसी तरह से भूख मिटाए
क्यों न वह बिल्ली को खाए ?
बिल्ली बैठी वृक्ष की डाली

नहीं पास वो आने वाली
किसी तरह बिल्ली को बुलाए
चालाकी से उसको खाए
झट से गया बिल्ली के पास
बोला! मौसी मुझको आस (उम्मीद)
तुम तो कितनी समझदार हो
और सब में से होशियार हो
कर दो मुझ पर भी अहसान
मुझे भी अपना शिष्य जान
मुझे भी थोडा ज्ञान सिखा दो
होशियारी का राज बता दो
कहना तेरा हर मानूँगा
सारी उम्र तक सेवा करूँगा
मौसी होती दूसरी माता
समझ लो गुरु-शिष्य का नाता
बड़ी चालाक थी बिल्ली रानी
समझ गई वो सारी कहानी
बोली सब कुछ सिखलाऊँगी
आरम्भ से सब बतलाऊँगी
सीखो तुम पंजे को चलाना
जाल मे अपने शिकार फँसाना
और फिर मुँह में उसको दबाना
मार के उसको मजे से खाना
बिल्ली ने शेर को सब बतलाया
पर न पेड पे चढ़ना सिखाया
शेर का मन , जो नहीं था साफ
करेगा न बिल्ली को माफ
वो तो बिल्ली को खाएगा
उसको ही भोज बनाएगा
सीख लिया उसने गुर सारा
अब तो शेर ने मन में विचारा
बहुत हुआ बिल्ली का भाषण
अब तो चाहिए मुझको भोजन


समझ गई बिल्ली भी चाल
आया उसको एक ख्याल
जब तक झपटा बिल्ली पे शेर
तब तक हो गई बहुत ही देर
चढ़ गई बिल्ली पेड के ऊपर
पहले से बैठी थी जिसपर
बैठ के ऊपर बोली! बच्चे
तुम हो अभी अकल के कच्चे
चल रहे थे मुझ संग चालाकी
पूरी न होगी शिक्षा बाकी
जो मैंने तुमको बतलाया
वो तो बस ऐसे भरमाया
असली राज न तुम्हें बताया
न तुम्हें पेड पे चढ़ना आया
हिम्मत है तो चढ़ के दिखाओ
भोजन अपना मुझे बनाओ


तुमने यह सोचा भी कैसे ?
बातों में तेरी फ़सुंगी ऐसे
दुश्मन पर एतबार करूँगी
और मैं तेरे हाथों मरूँगी
कभी नहीं यह हो सकता
शेर न दोस्त बन सकता
समझ शेर को अब सब आया
अपनी गलती पर पछताया
मन मसोस के शेर रह गया
और जाते-जाते यह कह गया
.....................
शिक्षा तो सच्चे मन से लो
बुरे विचार न मन में पालो
.....................
बच्चो तुम भी बात समझना
बुरे भाव न मन में रखना
रखना तुम सदा सच्चा मन
जिससे होगा सुखमय जीवन
दुश्मन पे एतबार न करना
धोखे से कभी वार न करना
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कान्हा की बाल-लीलाएं

http://www.shubhamsachdeva.blogspot.com/

नमस्कार बच्चो ,


गर्मी का मौसम और स्कूल में धेर सारी छुट्टियां , खूब मस्ती कर रहे हैं न । तो चलो इस मस्ती के मौसम में हम आपके लिए लाए हैं नटखट कान्हा की मस्त-मस्त बाल-लीलाएं , आप भी पढिए और खूब मस्ती कीजिए और हम भी जा रहे हैं छुट्टियों में मस्ती करने मेरा मतलब घूमने-फ़िरने । तब तक आप कान्हा की बाल लीलाओं का आनन्द लीजिए और हम आपसे मिलेंगे एक माह बाद । तब तक हैपी होलिडेज़.......
 


आज से मैं आपको सुनाऊंगी कान्हा की पावन बाल-लीलाएं

सर्व-प्रथम सुनिए उनके जन्म की कहानी
(१)

एक समय की बात सुनाऊं

जन्म कथा कान्हा की बताऊं

मथुरा का राजा था कंस

डूब गया जिसका सब वंस

एक थी उसकी बहन प्यारी

देवकी भाई की दुलारी

खुशी से उसका ब्याह रचाया

पूरा भाई का फ़र्ज़ निभाया

वासुदेव देवकी के संग

बरसे थे खुशियों के रंग

तभी एक आई आवाज

खोल दिया जिसने सब राज

खुशी से जिसका ब्याह रचाया

मारेगा तुम्हें उसी का जाया

आठवां सुत तेरा होगा काल

रखना इसका सदा ख्याल

सुनकर कंस क्रोध में आया

नाता उसनें सब भुलाया

तान ली देवकी पर तलवार

करने लगा वो ज्यों ही वार

पैर पकड बोला वासुदेव

क्षमा करो हे इसको देव

इसकी जो होगी संतान

ले लेना तुम उनकी जान

मानी कंस नें उसकी बात

दे दी जीवन की सौगात

न समझा कुदरत का खेल

दे दी अपनी बहन को जेल
 
एक बार मथुरा का राजा था , जिसका नाम था कंस । कंस की एक बहन थी देवकी । वह अपनी बहन से बहुत प्यार करता था । देवकी का विवाह वासुदेव से हुआ ।विवाहोपरान्त कंस अपनी बहन को खुशी-खुशी रथ पर बैठा कर ससुराल छोडने जा रहा था तो रास्ते में उसे एक आकाशवाणी सुनाई दी -
" हे कंस जिस बहन को तुम खुशी-खुशी विदा कर रहे हो उसी का आठवां पुत्र तुम्हारा काल होगा ।"
कंस को आकाशवाणी सुनकर बहुत क्रोध आया और उसने सोचा " अगर मैं बहन को ही मार दूं तो न यह जिन्दा बचेगी और न ही इसका कोई पुत्र होगा । फ़िर मुझे कोई भी नहीं मार सकेगा । यही सोचकर कंस जैसे ही अपनी बहन को मारने को तैयार हुआ -
ठहरो ! इसको मत मारो , इसने तुम्हारा क्या बिगाडा है । तुम्हें मारने वाला तो इसका पुत्र होगा फ़िर तुम इसे क्यों मार रहे हो ।
तुम चाहो तो इसके पुत्र को जन्म लेते ही मार देना , लेकिन इसकी जान क्यों ले रहे हो ।"
आवाज सुनकर कंस नें अपनी तलवार रोक ली और देखा तो वासुदेव उसके पैर पकडकर देवकी को न मारने की प्रार्थना कर रहा था । कंस नें वासुदेव की बात मान ली और और देवकी की हर संतान को उसे सौंपने का वादा लेकर देवकी और वासुदेव को कारागार में बंद कर दिया ।

पढ़ने वाले भैय्या, अँकल जी और आँटी जी,
आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
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मेरे लिये कुछ लिख भेजिये, ना ..प्लीज़ !

प्यारे बच्चो , आपको और सभी भारतवासियों को आजादी की हार्दिक बधाई और शुभ-काम्नायें । स्वतंत्रता दिवस पर पढिए देश भक्ति की रचनाएं यहां ......

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