बच्चों, बहुत खोजबीन के बाद, अचपन जी ने नन्हा मन पर उड़न तश्तरी उतारने में सफलता पाई ! देखा ? तो.. सी-बॉक्स में अपनी प्रतिक्रिया दो !

पढ़ने वाले भैय्या, अँकल जी और आँटी जी,
आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
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प्यारे बच्चो , आपको और सभी भारतवासियों को आजादी की हार्दिक बधाई और शुभ-काम्नायें । स्वतंत्रता दिवस पर पढिए देश भक्ति की रचनाएं यहां ......

22 जून 2009

परिणाम : बाल-रचना प्रतियोगिता - १ (तृतीय भाग)

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परिणाम : बाल-रचना प्रतियोगिता -
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"नन्हा मन" द्वारा आयोजित
बाल-रचना प्रतियोगिता - का परिणाम घोषित हो चुका है ।

प्रस्तुत है प्रतियोगिता की द्वितीय विजेता
रचना श्रीवास्तव
की कहानी

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अन्वी की सीख
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"अरे, अन्वी! देखो, तुमने अपना कमरा कितना गंदा किया है । सारा समान फैला के रखा है । एक भी चीज़ अपनी जगह पर नहीं है । जब कुछ भी चाहिए होगा, तुमको नहीं मिलेगा । गेम के सब पार्ट इधर-उधर हैं । कैसे खेलोगी ?" - माँ अन्वी को डाँटती जा रही थी और समान ठीक से रखती जा रही थी ।

अन्वी हमेशा ऐसा ही करती थी । एक
सामान निकाला, खेला और वहीं छोड़कर दूसरा निकाल लिया । इसी तरह खेल-खेलकर वह पूरे कमरे में सामान बिखरा देती । माँ को इस बात पर बहुत गुस्सा आता । अब अन्वी छोटी भी नहीं है । पूरे ७ साल की हो चुकी है । पर वो माँ की एक भी बात नहीं सुनती थी

माँ परेशान थी कि क्या करे । थक-हारकर माँ ने उसका कमरा साफ करना छोड़
दिया ।

दूसरे दिन स्कूल से आने के बाद अन्वी ने अपना होमवर्क किया और अपने रूम
में खेलने गई । पर उसको कोई भी चीज़ नहीं मिल रही थी । अन्वी को तो आदत थी कि वो जब दोबारा खेलने जाती तो सब चीज़ें अपनी जगह पर मिलती थीं ।

लेकिन आज माँ ने
कमरा ठीक क्यों नहीं किया ? - यह सोचकर अन्वी बहुत परेशान हो रही थी

"माँ, मुझे बार्बी की ड्रेस नहीं मिल
रही है ।" - अन्वी ज़ोर से चिल्लाई ।

"वहीँ होगी ।" - माँ ने दूर से ही कह दिया, पर अन्वी की हेल्प करने के लिए नहीं गई


अन्वी ने फिर
कहा - "माँ, मेरी पज़ल के दो पीस नहीं मिल रहे हैं ।"

पर माँ इस बार भी नहीं
गईअन्वी परेशान हो गई और रूम से बाहर आ गई । उसने अपना कमरा फिर भी ठीक नहीं किया । सोचा, माँ तो कर ही देंगी ।

रात होने पर माँ ने बताया - "बेटा,
कल से आप की गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हो गई हैं और कल ही हम शिमला जा रहें है ।"

"अरे, वाह!
नानी माँ
के पास !" - अन्वी की आवाज़ में ख़ुशी भर गई ।

"मुझे और पापा को जो समान ले जाना है, वह यहाँ रखा है । मैं पैकिंग करने जा रही हूँ
तुम भी अपना सामान ले आओ ।"

माँ ने कहा तो अन्वी बहुत खुश हुई । भागकर गई अपनी अलमारी से कपडे
लाने के लिए, पर पूरी अलमारी में कपडे बिखरे हुए पड़े थे । उस को कोई जींस मिल रही थी, तो उसका टॉप नहीं मिल रहा था । कोई टॉप मिल रहा था, तो उसकी स्कर्ट नहीं मिल रही थी । उसने माँ को बुलाया - "माँ मेरी हेल्प करो । कुछ भी नहीं मिल रहा है ।"

"जो मिले, ले के आ जाओ
। मुझे अभी बहुत काम है ।" - माँ ने जानबूझकर यह कहकर टाल दिया ।

अन्वी को जो भी उल्टा-सीधा मिला, ले के आ गई । माँ ने भी
बिना देखे बेमेल कपड़े रख दिए । अन्वी थोड़ी दुखी तो हुई, पर नानी से मिलने की ख़ुशी में सब भूल गई ।

नानी के घर जाकर अन्वी ने ख़ूब मस्ती की और गर्मी में शिमला के ठंडे मौसम का
उसने घूम-फ़िरकर पूरा आनंद भी लिया । कभी-कभी अपने बेमेल कपड़े देख के दुखी जरूर हो जाती थी । सरकस का शो देखकर उसे बहुत मज़ा आया ।

वहाँ नानी माँ ने अन्वी को
म्युजिक सुनानेवाली एक बहुत प्यारी गुड़िया लेकर दी । अन्वी को गुड़िया बहुत पसंद आई । गुड़िया को पा के वह बहुत ख़ुश थी । पूरे दिन उसको गोद में ले के घूमती रही । घर आने के बाद भी वो बालकनी में बैठ के गुड़िया के साथ खेलती रही । नानी माँ ने जब खाने के लिए बुलाया, तो जैसी कि अन्वी की आदत थी, गुड़िया को वहीं छोड़ के आ गई ।

खाना खा के सभी लोग सो गए । अगली सुबह सब सामान रख
के माँ-पापा के साथ अन्वी भी ख़ुशी-ख़ुशी वापस आ गई । घर पहुँच के माँ सामान निकालने लगी ।

अन्वी ने कहा - "माँ, प्लीज़ मुझे
गुड़िया दे दो न ।"

"बेटा, तुमने कहाँ रखी थी?
मुझे तो नहीं मिल रही है ।" - माँ ने बताया ।

अन्वी ने सारे सामान में खोजा, पर
गुड़िया नहीं मिली । वो माँ के गले लग के रोने लगी - "माँ, मैने सोचा था अपनी फ्रेंड्स को दिखाऊँगी । पर अब कैसे दिखाऊँगी ? लगता है गुड़िया नानी माँ की बालकनी में ही छूट गई । मेरी ही लापरवाही से ।"

इतने में माँ ने छुपाकर रखी हुई गुड़िया निकाल के अन्वी को दिखाई । अन्वी बहुत ख़ुश हो गई । दौड़ के आई और माँ से लिपट के बोली - "मेरी अच्छी माँ, अब से मैं हमेशा अपना सामान सँभाल के रखूँगी ।"


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प्रमाण-पत्र
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बाल मन की कोमलता को सँवारने का समवेत प्रयास
नन्हा मन
बाल-रचना प्रतियोगिता -

श्रीमती रचना श्रीवास्तव

(लखनऊ, भारत ♥ डैलस,अमेरिका) ने इस प्रतियोगिता के प्रतिभाग कर

अपनी कहानी "अन्वी की सीख" पर द्वितीय स्थान प्राप्त किया ।

इन्हें निर्णायकों द्वारा प्रथम चरण में 08 और

द्वितीय चरण में 05 अंक प्रदान किए गए ।

इस प्रकार इन्हें 20 आओ से कुल 13 अंक प्राप्त हुए ।

द्वितीय स्थान प्राप्त करने पर

हम सबकी ओर से आपको हार्दिक बधाई ।

-- निर्याणक गण --

आचार्य संजीव वर्मा सलिल

और

डॉ. ज़ाकिर अली रजनीश

-- संयोजक : बाल-रचना प्रतियोगिता - १ --

रावेंद्रकुमार रवि

-- निवेदक --

सीमा सचदेव ( संपादक : नन्हा मन )

2 जन ने कहा है:

Nirmla Kapila ने कहा…

बहुत प्रेरक बाल रचना है रचना जी को बहुत बहुत बधाई आभार्

manu ने कहा…

एक टिप्पणी भेजें

कैसा लगा.. अच्छा या बुरा ?
कुछ और भी चाहते हैं, आप..

इसमें बुरा लगने वाला भी कुछ होता है क्या...?
अन्वी की ये दूसरी कहानी पढी है,,,
मेरे जैसे ला-परवाह बच्चों को बहुत ही सुंदर अंदाज़ में सीख दी गयी है,,,,,
आपका बहुत बहुत धन्यवाद रचना जी,
सादर
मनु...

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