बच्चों, बहुत खोजबीन के बाद, अचपन जी ने नन्हा मन पर उड़न तश्तरी उतारने में सफलता पाई ! देखा ? तो.. सी-बॉक्स में अपनी प्रतिक्रिया दो !

पढ़ने वाले भैय्या, अँकल जी और आँटी जी,
आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
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प्यारे बच्चो , आपको और सभी भारतवासियों को आजादी की हार्दिक बधाई और शुभ-काम्नायें । स्वतंत्रता दिवस पर पढिए देश भक्ति की रचनाएं यहां ......

07 अप्रैल 2010

आओ सुनाऊं एक कहानी

नमस्कार बच्चो ,
जब हम बहुत छोटे थे बिल्कुल आपके जैसे तो हमें कहानी सुनना बहुत अच्छा लगता था (अब भी अच्छा लगता है) । हम हर रोज जब तक कहानी सुन न लेते तब तक आंखों में निद्रा आती ही नहीं और कहानी सुनते-सुनते कब सो जाते और कहानी आधी-अधूरी ही सुन पाते कि पहुंच जाते मीठी-मीठी निद्रा के आगोश में । रात भर कहानी कानों में गूंजती रहती और कब सुबह हो जाती पता ही न चलता । तब कभी दादा-दादी तो कभी नाना-नानी और कभी मम्मी पापा कहानी सुनाते और उनकी कहानियां होतीं इतनी लम्बी कि न जाने कितने-कितने दिन तक वह कहानी चलती उसकी शुरुआत कहां से हुई और अंत कहां हुआ तब इतना सोचने की बुद्धि ही नहीं थी , हां एक बात अवश्य याद रखते थे कि पिछली रात की कहानी हमनें कहां तक सुनी । यह हमें याद रखना ही पडता था ताकि रात को कहानी की आगे की शुरुआत में ज्यादा समय बर्बाद न हो और प्टाक से कहानी आगे बढे । अब इतनी लम्बी-लम्बी कहानियां याद तो नहीं लेकिन वो कहानियां वास्तव में कहानियां होती थीं । मैनें सुना है कि कहानी का एक गुण यह भी होता है कि आगे क्या हुआ जानने की लालसा बनी रहे , तो वो लालसा तो हम में भरपूर होती थी इतनी कि सुबह होते ही रात होने का इंतजार रहता । अकसर उन कहानियों के नायक-नायिका होते राजा और रानी । कहानी कोई भी हो शुरुआत होती - एक था राजा एक थी रानी , और उसका अंत होता - दोनों मर गए खत्म कहानी । अब बींच में कहानी में अनगिनत उतार-चढाव और मोड आए , अमीर से गरीब , बच्चे से बूढे , राजा से रंक , आकाश से पाताल , गंवार से समझदार..... मतलब जो भी आया उसके गर्भ में समा गया । किस चरित्र को कहां , कैसे फ़िट करना है , इस कला में अवश्य ही कहानी विख्याता माहिर थे ।धन्य थी उनकी कला जो बिना सोचे उनकी वाणी से निकल हमारे अंतर्मन में कहीं इतने गहरे समा जाती कि सारा दिन दूसरों की नींद हराम करने वाले बिना किसी हलचल के आराम से सो जाते । एक और खास बात होती थी कि जब कहानी शुरु होती तो केवल एक ही मधुर सी आवाज सुनाई देती और वो होती वक्ता की आवाज़ , बाकी सब न जाने इतने शान्त कैसे हो जाते , न कोई शरारत मन में सूझती और न ही इधर-उधर से कोई छेडखानी होती । ऐसी आकर्षण क्षमता तो शायद चुंबक में भी न होगी । कहानी सुनते-सुनते कई स्वाल मन में उठते भी तो उन्हें दबा लेते ताकि कहानी में विघ्न न पडे , वर्ना और कुछ न हुआ तो भाई-बहनों से पिटाई अवश्य हो जाएगी ।
अरे ! मैं भी...क्या सुनाने तो आई थी आपको कहानी और इतनी सारी बातें सुनाने लगी और देखो न आपने भी तो नहीं बोला अब बातें बस करो और कहानी सुनाओ .....:) और कहानी सुनाते-सुनाते मुझे नींद आ रही है । तो मैं थोडी देर सो लूं । मिलते हैं शाम को कहानी के साथ , तब तक आप सोचिए .....बाय-बाय ।
आपकी
सीमा सचदेव

4 जन ने कहा है:

डा० अमर कुमार ने कहा…


हाय रे.. कित्ता अच्छा होता कि जल्दी से शाम हो जाये ।
पता नहीं दीदी कौन सी कहानी सुनाने वाली हैं ।
आपने कोई हिन्ट भी नहीं दिया,
दीदी बड़ी चालाक हैं ।

Shekhar kumawat ने कहा…

bahut sundar

wow !!!!!!!!!!


shekhar kumawat

http://kavyawani.blogspot.com/

Amitraghat ने कहा…

बहुत बढ़िया पोस्ट.....कहानी तो लगभग एक-सी होती हैं बस सुनाने का अन्दाज़ उसे जुदा बना देता है और अच्छे दास्ताँगो ही बेहतरीन स्क्रिप्ट राईटर होते हैं............"

अक्षिता (पाखी) ने कहा…

बहुत प्यारी कहानी..अब शाम की कहानी का इंतजार...


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'पाखी की दुनिया' में जरुर देखें-'पाखी की हैवलॉक द्वीप यात्रा' और हाँ आपके कमेंट के बिना तो मेरी यात्रा अधूरी ही कही जाएगी !!

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