खेलो की राजधानी
खेलों की राजधानी
राष्ट्रकुल खेलों की धूम मची
दुल्हन बन राजधानी है सजी
प्रतियोगियों में होड़ है लगी
वंदना में आरती है सजी ।
मुस्कान से भरा हुआ है शेरा
साहस ,शक्ति , शौर्य , शेर - सा
खिलाड़ियों का लगा है मेला
जश्न , जोश , जीत की झड़ी है लगी ।
चुनौतियों से मंजिल है भरी
प्रयास से सफलता मिलती
स्वर्ण , रजत , कांस्य पदकों से
जीत को ' मंजू ' ख़ुशी है मिलती ।
- मंजू गुप्ता ,
वाशी , नवी मुंबई ।










7 जन ने कहा है:
अरे वाह अपने तो हमारे देश में हो रहे खेलों को लेकर
कितनी सुंदर कविता बनाई..... मुझे तो बहुत ही अच्छी लगी
भाई चैतन्य जी ,
नमस्ते .
मेरा हौसला बढ़ाने के लिए धन्यवाद .
बहुत सुन्दर कविता लिखी है आपने .......आभार
नन्ही ब्लॉगर
अनुष्का
सुन्दर बाल कविता के लिए
मंजू गुप्ता जी को बधाई!
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आपकी इस पोस्ट की चर्चा
बाल चर्चा मंच पर भी की गई है!
http://mayankkhatima.blogspot.com/2010/10/21.html
आदरणीय गुरूजी मयंक जी ,
सादर नमस्ते .
आप के प्रेषित विचार मेरे लिए अनमोल हैं . धन्यवाद .
बाल चर्चा मंच से मुझे अवगत कराएं .मुझे इसकी जानकारी नहीं है .
प्रिय नन्ही -सी रानी .
असीम स्नेह .
आप के मनोभाव पढकर मेरी मुस्कान दुगनी हो गई .आभार .
लेट्स गो , जियो.. , उठो.., बढ़ो... , जीतो....
माधव जी ,
नमस्ते .
खेलों के लिए प्रेरणात्मक संदेश दिया ,आभार .
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