बच्चों, बहुत खोजबीन के बाद, अचपन जी ने नन्हा मन पर उड़न तश्तरी उतारने में सफलता पाई ! देखा ? तो.. सी-बॉक्स में अपनी प्रतिक्रिया दो !

पढ़ने वाले भैय्या, अँकल जी और आँटी जी,
आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
आप सब को नन्हें मन का नमस्ते.. प्रणाम.. सत श्री अकाल !
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प्यारे बच्चो , आपको और सभी भारतवासियों को आजादी की हार्दिक बधाई और शुभ-काम्नायें । स्वतंत्रता दिवस पर पढिए देश भक्ति की रचनाएं यहां ......

30 अक्तूबर 2009

माता पिता में सकल जहान

नमस्कार बच्चो ,

आप सब अपने माता-पिता से बहुत प्यार करते हैं न । माता-पिता से बढकर दुनिया में कुछ नहीं होता । उन्हीं के चरणों में सम्पूर्ण विश्व समाया है , माता-पिता के आगे स्म्पूर्ण ब्रह्माण्ड भी तुच्छ है । श्री गणेश जी नें भी हमें यही संदेश दिया है । आओ मैं आपको उनकी एक काव्य-कथा सुनाती हूं , जिसमें उन्होंने माता-पिता को सम्पूर्ण संसार बता कर अपने बलशाली भाई कार्तिकेय को भी पराजित कर दिया था ।



पार्वती नन्दन गणेश
पूजा है जिनकी अति विशेष
सर्व-प्रथम जिनका वन्दन
वो गणपति बप्पा जगनन्दन
है जन-जन पर जिसकी दष्टि
उसे माता पिता ही सकल सष्टि
सुन लो एक बार की बात
खेल रहे भाई के साथ
दोनों खेल-खेल के बहाने
लगे जोर अपना आजमाने
कार्तिकेय बोले हे गणेश
ताकत है मुझमें विशेष
तुम तो बस खाते ही रहते
या आसन पर बैठे रहते
न तुम कभी करो व्यायाम
हर पल बस पढने का काम
बिन ताकत के थोथा ग्यान
लो ताकत से जीत जहान
देखो मैं कितना बलशाली
कर सकता जग की रखवाली
खडे दूरी पर नारदमुनि
कार्तिकेय की बात सुनी
सुनकर उनके पास में आए
बोले अपना शीश झुकाए
प्रतियोगिता से होगा निर्णय
देखो मिलेगी किसे विजय
दोनों भाई हुए तैयार
नापेंगे सकल संसार
विश्व घूम पहले जो आए
वही तो बलशाली कहलाए
कार्तिकेय खुश मन ही मन
जीत नहीं सकता गजानन
प्रथम तो बस मैं ही आऊंगा
बलशाली मैं कहलाऊंगा
घूमने निकल पडे संसार
गणपति गए बस घर के द्वार
एक विचार यूं मन में जन्मा
शिव-गौरी की ली परिक्रमा
बैठ गए आ मां की गोद
लगे वो करने हास-विनोद
बोले नारद हे गजानन
लांघा नहीं घर का आंगन
मिलेगी कैसे तुम्हें विजय
जीतेगा बस कार्तिकेय
चेहरे पर लाकर मुस्कान
बोले कार्तिकेय नादान
माता-पिता में विश्व समाया
न जाने वो क्यों भरमाया
कर लिया पूरा मैने काम
मां की गोदि में करूं आराम
जब उनसे यह बात सुनी
गिरे चरणों में नारद मुनि
बात समझ में उनके आई
माता-पिता में सष्टि समाई
घूम के जब कार्तिकेय आया
नारद जी ने यह समझाया
माता-पिता से करे जो प्यार
पूजता है उनको संसार
माता-पिता ही जग में महान
खुल गए कार्तिकेय के कान
खेल खेल में दिया संदेश
माता पिता ब्रह्म विष्णु महेश
माता पिता का करे जो वंदन
कट जाते उसके सब बंधन

2 जन ने कहा है:

माधव ने कहा…

मै भी अपने मम्मी पापा को बहुत प्यार करता हूँ और मात पिता के चरणों को स्वर्ग मानता हु

अर्शिया ने कहा…

अच्छी कविता है, लेकिन कॉमा, फलस्टाप लगादे, तो कविता सुंदर दिखती है।
--------------
स्त्री के चरित्र पर लांछन लगाती तकनीक
आइए आज आपको चार्वाक के बारे में बताएं

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